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Mantra Rig 01.038.005

MANTRA NUMBER:

Mantra 5 of Sukta 38 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 15 of Adhyaya 3 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 40 of Anuvaak 8 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- कण्वो घौरः

देवता (Devataa) :- मरूतः

छन्द: (Chhand) :- पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री;

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

मा वो॑ मृ॒गो यव॑से जरि॒ता भू॒दजो॑ष्यः प॒था य॒मस्य॑ गा॒दुप॑

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

मा वो मृगो यवसे जरिता भूदजोष्यः पथा यमस्य गादुप

 

The Mantra's transliteration in English

mā vo mgo na yavase jaritā bhūd ajoya | pathā yamasya gād upa 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

मा वः॒ मृ॒गः यव॑से ज॒रि॒ता भू॒त् अजो॑ष्यः प॒था य॒मस्य॑ गा॒त् उप॑

 

The Pada Paath - transliteration

mā | va | mga | na | yavase | jaritā | bhūt | ajoya | pathā | yamasya | gāt | upa 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३।०

मन्त्रविषयः-

तत्सम्बंधेन जीवस्य किं भवतीत्युपदिश्यते।

उन वायुओं के संबंध से जीव को क्या होता है, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

 

पदार्थः-

(मा) निषेधार्थे (वः) एतेषां मरुताम् (मृगः) हरिणः (न) इव (यवसे) भक्षणीये घासे (जरिता) स्तोता जनः (भूत्) भवेत्। अत्र बहुलं छन्दस्यमाङ्योगेपि# इत्यडभावः*। (अजोष्यः) असेवनीयः (पथा) श्वासप्रश्वासरूपेण मार्गेण (यमस्य) निग्रहीतुर्वायोः (गात्) गच्छेत्। अत्र +लडर्थे लुङडभावश्च। (उप) सामीप्ये ॥#[अ६।४।७५।] *[लिङ् र्थे लुङच।सं।] +[लिङ् र्थे लुङ्। सं]

हे राजा और प्रजा के जनों ! आप लोग (न) जैसे (मृगः) हिरन (यवसे) खाने योग्य घास खाने के निमित्त प्रवृत्त होता है वैसे (वः) तुम्हारा (जरिता) विद्याओं का दाता (अजोष्यः) असेवनीय अर्थात् पृथक् (मा भूत्) न होवे तथा (यमस्य) निग्रह करनेवाले वायु के (पथा) मार्ग से (मोप गात्) कभी अल्पायु होकर मृत्यु को प्राप्त न होवे, वैसा काम किया करो ॥

 

अन्वयः-

हे राजप्रजाजना यूयं यवसे मृगो नेव वो जरिताजोष्यो मा भूत् यमस्य पथा च मोप गादेवं विधत्त ॥


 

भावार्थः-

अत्रोपमालंकारः। यथा हरिणा निरन्तरं घासं भक्षयित्वा सुखिनो भवन्ति तथा प्राणविद्याविन्मनुष्यो युक्त्याऽऽहारविहारं कृत्वा यमस्य मार्गं मृत्युं नोपगच्छेत् पूर्णमायुर्भुक्त्वा शरीरं सुखेन त्यजेत्  

इस मंत्र में उपमालंकार है। जैसे हिरन युक्ति से निरन्तर घास खा-कर सुखी होते हैं वैसे प्राण वायु की विद्या को जाननेवाला मनुष्य युक्ति के साथ अहार-विहार कर वायु के ¤मार्ग से अर्थात् मृत्यु को प्राप्त नहीं होता और संपूर्ण अवस्था को भोग के सुख से शरीर को छोड़ता है अर्थात् सदा विद्या पढ़ें पढ़ावें कभी विद्यार्थी और आचार्य वियुक्त न हों और प्रमाद करके अल्पायु में न मर जायें ॥¤[संभाके अनुसार मार्ग को।सं] [इसमें आगे का भाग संस्कृत भाष्य में नहीं है। सं]

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