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Mantra Rig 01.038.003

MANTRA NUMBER:

Mantra 3 of Sukta 38 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 15 of Adhyaya 3 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 38 of Anuvaak 8 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- कण्वो घौरः

देवता (Devataa) :- मरूतः

छन्द: (Chhand) :- पादनिचृद्गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

क्व॑ वः सु॒म्ना नव्यां॑सि॒ मरु॑त॒: क्व॑ सुवि॒ता क्वो॒३॒॑ विश्वा॑नि॒ सौभ॑गा

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

क्व वः सुम्ना नव्यांसि मरुतः क्व सुविता क्वो विश्वानि सौभगा

 

The Mantra's transliteration in English

kva va sumnā navyāsi maruta kva suvitā | kvo viśvāni saubhagā 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

क्व॑ वः॒ सु॒म्ना नव्यां॑सि मरु॑तः क्व॑ सु॒वि॒ता क्वो॒इति॑ विश्वा॑नि सौभ॑गा

 

The Pada Paath - transliteration

kva | va | sumnā | navyāsi | maruta | kva | suvitā | kva | viśvāni | saubhagā 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३।०३

मन्त्रविषयः-

पुनस्तदेवाह।

फिर भी उक्त विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

 

पदार्थः-

(क्व) कुत्र (वः) युष्माकं विदुषाम् (सुम्ना) सुखानि। अत्र सर्वत्र शेश्छन्दसि बहुलम् #इति शेर्लोपः। (नव्यांसि) नवीयांसि नवतमानि। अत्र छान्दसो वर्णलोपो वा इति ईकारलोपः। (मरुतः) वायुवच्छीघ्रं गमनकारिणो जनाः (क्व) कस्मिन् (सुविता) प्रेरणानि (क्वो) कुत्र। अत्र वर्णव्यत्ययेन अकारस्थान ओकारः। (विश्वा) सर्वाणि (सौभगा) सुभगानां कर्म्माणि। अत्र उद्गातृत्वादञ्* ॥३॥ #[पा ६।१।७०।] *[पा ५।१।१२९]

हे (मरुतः) वायु के समान शीघ्र गमन करनेवाले मनुष्यो ! तुम लोग विद्वानों के समीप प्राप्त होकर (वः) आप लोगों के (विश्वानि) सब (नव्यांसि) नवीन (सुम्ना) सुख (क्व) कहां सब (सुविता) प्रेरणा करानेवाले गुण (क्व) कहां और सब नवीन (सौभगा) सौभाग्य प्राप्ति करानेवाले कर्म (क्वो) कहां है ऐसा पूछो ॥३॥

 

अन्वयः-

हे मरुतो मनुष्या यूयं विदुषां सदेशं प्राप्य वो युष्माकं क्व विश्वानि नव्यांसि सुम्ना क्व सुविता सौभगाः सन्तीति पृच्छत ॥३॥

 

 

भावार्थः-

अत्र लुप्तोपमालङ्कारः। हे शुभे कर्म्माणि वायुवत् क्षिप्रं गन्तारो मनुष्या युष्माभिर्विदुषः प्रति पृष्ट्वा यथा नवीनानि क्रियासिद्धिनिमित्तानि कर्म्माणि नित्यं प्राप्येरंस्तथा प्रयतितव्यम् ॥३॥

इस मंत्र में लुप्तोपमालंकार है। हे शुभ कर्मों में वायु के समान शीघ्र चलनेवाले मनुष्यों ! तुम लोगों को चाहिये कि विद्वानों के प्रति पूछ कर जिस प्रकार नवीन क्रिया की सिद्धि के निमित्त कर्म प्राप्त होवें वैसा अच्छे प्रकार निरन्तर यत्न किया करो ॥३॥

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