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Mantra Rig 01.037.015

MANTRA NUMBER:

Mantra 15 of Sukta 37 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 14 of Adhyaya 3 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 35 of Anuvaak 8 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- कण्वो घौरः

देवता (Devataa) :- मरूतः

छन्द: (Chhand) :- पिपीलिकामध्यानिचृद्गायत्री;

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अस्ति॒ हि ष्मा॒ मदा॑य व॒: स्मसि॑ ष्मा व॒यमे॑षाम् विश्वं॑ चि॒दायु॑र्जी॒वसे॑

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अस्ति हि ष्मा मदाय वः स्मसि ष्मा वयमेषाम् विश्वं चिदायुर्जीवसे

 

The Mantra's transliteration in English

asti hi mā madāya va smasi mā vayam eām | viśva cid āyur jīvase 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अस्ति॑ हि स्म॒ मदा॑य वः॒ स्मसि॑ स्म॒ व॒यम् ए॒षा॒म् विश्व॑म् चि॒त् आयुः॑ जी॒वसे॑

 

The Pada Paath - transliteration

asti | hi | sma | madāya | va | smasi | sma | vayam | eām | viśvam | cit | āyu | jīvase 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३।१५

मन्त्रविषयः-

पुनस्ते वायवः किं प्रयोजनाः सन्तीत्युपदिश्यते।

फिर वे वायु किस-२ प्रयोजन के लिये हैं, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

 

पदार्थः-

(अस्ति) वर्त्तते (हि) यतः (स्म) खलु। अत्र निपातस्य च इति दीर्घः। अविहितलक्षणो मूर्द्धन्यः सुषामादिषु द्रष्टव्यः। अ० ।३।९८। इति वार्त्तिकेन मूर्द्धन्यादेशः। इदं पदं सायणाचार्येण व्याकरणविषयमबुद्ध्वा त्यक्तम्। (मदाय) आनन्दाय (वः) युष्माकम् (स्मसि) भवेम। अत्र लिङर्थे लट्। इदन्तोमसि* इतीकारागमः (स्म) तैरन्तर्ये। अत्रापि पूर्ववन्मूर्द्धन्यादेशः। (वयम्) उपदेश्या जनाः (एषाम्) ज्ञातविद्यानां मरुतां सकाशात् (विश्वम्) सर्वम् (चित्) अपि (आयुः) प्राणधारणम् (जीवसे) जीवितुम्। अत्र तुमर्थे०¤ इत्यसेन्प्रत्ययः ॥१॥ *[अ७।१।४६।] ¤[० ३।४।९]

हे विद्वान् मनुष्यो ! (एषाम्) जानी हे विद्या जिन की उन पवनों के सकाश से (हि) जिस कारण (स्म) निश्चय करके (वः) तुम लोगों के (मदाय) आनन्दपूर्वक (जीवसे) जीने के लिये (विश्वम्) सब (आयुः) अवस्था है इसी प्रकार (वयम्) आप से उपदेश को प्राप्त हुए हम लोग (चित्) भी (स्मसि, स्म) निरन्तर होवें ॥१

 

अन्वयः-

हे विद्वांसो मनुष्या एषां हि स्म वो युष्माकं मदाय जीवसे विश्वमायुरस्ति तथाभूता वयं चित्स्मसि स्म ॥१

 

 

भावार्थः-

यथा योगाभ्यासेन प्राणविद्याविदो वायुविकारज्ञाः पथ्यकारिणो जनाश्वानन्देन सर्वमायुर्भुञ्जते तथैवेतरैर्जनैस्तत्सकाशात्तद्विद्यां ज्ञात्वा सर्वमायुर्भोक्तव्यम् ॥१मोक्षमूलरोक्तिः निश्चयेन तत्र युष्माकं प्रसन्नता पुष्कलास्ति वयं सदा युष्माकं भृत्याः स्मः। यद्यपि वयं सर्वमायुर्जीवेमेत्यशुद्धास्ति कुतः। अत्र प्रमाणरूपेण वायुना जीवनं भवतीति वयमेतद्विद्यां विजानीमेत्युक्तत्वादिति ॥१

एवमेव यथात्र मोक्षमूलरेण कपोलकल्पनया मन्त्रार्था विरुद्धा वर्णितास्तघेवाग्रेप्येतदुक्तिरन्यथास्तीति वेदितव्यम्। यदा पक्षपातविरहा विद्वांसो मद्रचितस्य मंत्रार्थ भाष्यस्य मोक्षमूलरोक्तादेश्च सम्यक् परीक्ष्य विवेचनं करिष्यन्ति तदैतेषां कृतावशुद्धिर्विदिता भविष्यतीत्यलमिति विस्तरेणा अत्राग्निप्रकाशकस्य सर्वचेष्टाबलायुर्निमित्तस्य वायोस्तद्विद्याविदां राजप्रजाश्वविदुषां च गुणवर्णनादेतत्सूक्तार्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह संगतिरस्तीति वेद्यम् ॥

इति चतुर्दशो वर्गः सप्तत्रिंशं सूक्तश्च समाप्तम् ॥३

जैसे योगाभ्यास करके प्राणविद्या और वायु के विकारों को ठीक-२ जानने वाले पथ्यकारी विद्वान् लोग आनन्दपूर्वक सब आयु भोगते हैं वैसे अन्य मनुष्यों को भी करनी चाहिये कि उन विद्वानों के सकाश से उस वायु विद्या को जानके संपूर्ण आयु भोगें ॥१

मोक्षमूलर की उक्ति है कि निश्चय करके यहां तुम्हारी प्रसन्नता पुष्कल है हम लोग सब दिन तुम्हारे भृत्य हैं जो भी हम संपूर्ण आयु भर जीते हैं- यह अशुद्ध है। क्योंकि यहां प्राणरूप वायु से जीवन होता है हम लोग इस विद्या को #जानते हैं इस प्रकार इस मन्त्र का अर्थ है ॥१

इसी प्रकार कि जैसे यहां मोक्षमूलर साहेब ने अपनी कपोल कल्पना से मंत्रो के अर्थ विरुद्ध वर्णन किये हैं वैसे आगे भी इनकी उक्ति अन्यथा ही है ऐसा सबको जानना चाहिये। जब पक्षपात को छोड़ कर मेरे रचे हुए मन्त्रार्थ भाष्य वा मोक्षमूलरादिकों के कहे हुए की परीक्षा करके विवेचन करेंगे तब इनके किये हुए ग्रन्थों की अशुद्धि जान पड़ेगी बहुत को थोड़े ही लिखने से जान लेवें आगे। आगे अब बहुत लिखने से क्या है।

इस सूक्त में अग्नि के प्रकाश करनेवाले सब चेष्टा बल और आयु के निमित्त वायु और उस वायु विद्या को जानने वाले राज* प्रजा के विद्वानों के गुण वर्णन से इस सूक्तार्थ की पूर्व सूक्तार्थ के साथ संगति जाननी चाहिये।

यह चौदहवां वर्ग और सैंतीसवां सूक्त समाप्त हुआ ॥३॥ #[सं के अनुसार ‘जाने’। सं]*[ सं वा के अनुसार ‘राजा, प्रजा, अश्वों और विद्वानों। सं]

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