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Mantra Rig 01.037.011

MANTRA NUMBER:

Mantra 11 of Sukta 37 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 14 of Adhyaya 3 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 31 of Anuvaak 8 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- कण्वो घौरः

देवता (Devataa) :- मरूतः

छन्द: (Chhand) :- निचृद्गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

त्यं चि॑द्घा दी॒र्घं पृ॒थुं मि॒हो नपा॑त॒ममृ॑ध्रम् प्र च्या॑वयन्ति॒ याम॑भिः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

त्यं चिद्घा दीर्घं पृथुं मिहो नपातममृध्रम् प्र च्यावयन्ति यामभिः

 

The Mantra's transliteration in English

tya cid ghā dīrgham pthum miho napātam amdhram | pra cyāvayanti yāmabhi 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

त्यम् चि॒त् घ॒ दी॒र्घम् पृ॒थुम् मि॒हः नपा॑तम् अमृ॑ध्रम् प्र च्य॒व॒य॒न्ति॒ याम॑ऽभिः

 

The Pada Paath - transliteration

tyam | cit | gha | dīrgham | pthum | miha | napātam | amdhram | pra | cyavayanti | yāma-bhiḥ 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३।११

मन्त्रविषयः-

पुनरेते किं कुर्युरित्युपदिश्यते।

फिर ये राजपुरुष क्या करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

 

पदार्थः-

(त्यम्) मेघम् (चित्) अपि (घ) एव। अत्र ऋचि तुनुघ इति दीर्घः। (दीर्घम्) स्थूलम् (पृथुम्) विस्तीर्णम् (मिहः) सेचनकर्त्तारः। अत्र इगुपधलक्षणः# कः प्रत्ययः। सुपां सुलुग् इति जसः स्थाने सुः। (नपातम्) यो न पातयति जलं तम्। अत्र *नभ्राण नपात् इति निपातनम् (अमृध्रम्) न मर्धते नोनत्ति तम्। अत्र नञ्पूर्वान्मृघधातोर्बाहुलकादौणादिकोरक् प्रत्ययः। (प्र) प्रकृष्टार्थे (च्यावयन्ति) पातयन्ति (यामभिः) यांत्यायान्ति यैस्तैः स्वकीयगमनागमनैः ॥११#[इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः। अ ३।१।१३५। इत्यनेन सूत्रेण। सं०] *[न भ्राण न पान्नवेदा। अ ३।७५। इत्यनेन सूत्रेण। सं०]

हे राजपुरुषो ! तुम लोग जैसे (मिहः) वर्षा जल से सींचने वाले पवन (यामभिः) अपने जाने के मार्गों से (घ) ही (त्यम्) उस (नपातम्) जल को न गिराने और (अमृध्रम्) गीला न करनेवाले (पृथुम्) बड़े (चित्) भी (दीर्घम्) स्थूल मेघ को (प्रच्यावयन्ति) भूमि पर गिरा देते हैं वैसे शत्रुओं को गिराके प्रजा को आनन्दित करो ॥११

 

अन्वयः-

हे राजपुरुषा यूयं यथा मिहो वृष्ट्या सेचनकर्त्तारो मरुतो यामभिघैव नपातममृध्रं पृथुं दीर्घंत्यं चिदपि प्र च्यावयन्ति तथा शत्रून् प्रच्याव्य प्रजा आनन्दयत ॥११

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। राजपुरुषैर्यथा मरुत एव मेघनिमित्तं पुष्कलं ज्वलमुपरि गमयित्वा परस्परं घर्षणेन विद्युतमुत्पाद्य तत्समूहमपतनशीलमतुन्दनीयं दीर्घावयवं मेघं भूमौ निपातयन्ति तथैव धर्मविरोधिनः सर्वव्यवहाराः प्रच्यावनीयाः ॥११ 

मोक्ष मूलरोक्तिः। ते वायवोऽस्य दीर्घकालं वर्षतोऽप्रतिबद्धस्य मेघस्य निमित्तं सन्ति पातनाय मार्गस्योपरि। इति किंचिच्छुद्धास्ति। कुतः। मिह इति मरुतां विशेषणमस्त्यनेन मेघविशेषणं कृतमस्त्यतः ११

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजपुरुषों को चाहिये कि जैसे पवन ही मेघ के निमित्त बहुत जल को ऊपर पहुंचा कर परस्पर घिसने से बिजुली को उत्पन्न कर उसे न गिरने योग्य तथा न गीला करने और बड़े आकार वाले मेघ को भूमि में गिराते हैं वैसे ही धर्म विरोधी सब व्यवहारों को छोड़ें और छुड़ावें ॥११

मोक्षमूलर की उक्ति है कि वे पवन इस बहुत काल वर्षा कराते हुए अप्रतिबद्ध मेघ# के निमित्त और मार्ग के ऊपर गिराने के लिये हैं यह कुछेक अशुद्ध हैं। क्योंकि (मिहः) यह पद पवनों का विशेषण है और इन्होंने मेघ का विशेषण किया है ॥११#[सं० भा० के अनुसार-मेघ के मार्ग पर गिराने के निमित्त हैं। सं०]

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