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Mantra Rig 01.037.009

MANTRA NUMBER:

Mantra 9 of Sukta 37 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 13 of Adhyaya 3 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 29 of Anuvaak 8 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- कण्वो घौरः

देवता (Devataa) :- मरूतः

छन्द: (Chhand) :- निचृद्गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

स्थि॒रं हि जान॑मेषां॒ वयो॑ मा॒तुर्निरे॑तवे यत्सी॒मनु॑ द्वि॒ता शव॑:

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

स्थिरं हि जानमेषां वयो मातुर्निरेतवे यत्सीमनु द्विता शवः

 

The Mantra's transliteration in English

sthira hi jānam eā vayo mātur niretave | yat sīm anu dvitā śava 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

स्थि॒रम् हि जान॑म् ए॒षा॒म् वयः॑ मा॒तुः निःऽए॑तवे यत् सी॒म् अनु॑ द्वि॒ता शवः॑

 

The Pada Paath - transliteration

sthiram | hi | jānam | eām | vaya | mātu | ni-etave | yat | sīm | anu | dvitā | śavaḥ 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३।०

मन्त्रविषयः-

पुनस्ते वायवः कीदृशगुणाः सन्तीत्युपदिश्यते।

फिर वे वायु कैसे गुणवाले हैं, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

 

पदार्थः-

(स्थिरम्) गमनरहितम् (हि) खलु (जानम्) जायते यस्मात्तदाकाशम्। अत्र जनधातोर्धञ् स्वरव्यत्ययेनाद्युदात्तत्वम्। सायणाचार्येणेदं जनिवध्योरित्यादीनामबोधादुपेक्षितम् (एषाम्) वायूनाम् (वयः) पक्षिणः (मातुः) अन्तरिक्षस्य मध्ये (निरेतवे) निरन्तरमेतुं गन्तुम् (यत्) (सीम्) सर्वतः (अनु) अनुक्रमेण (द्विता) द्वयोः शब्दस्पर्शयोर्गुणयोर्भावः (शवः) बलम्। शव इति बलनामसु पठितम्। निघं० २।। ॥

हे मनुष्यो ! (एषाम्) इन (वायूनाम्) पवनों का (यत्) जो (स्थिरम्) निश्चल (जानम्) जन्मस्थान आकाश (शवः) बल और जिस में (द्विता) शब्द और स्पर्श गुण का योग है जिसके आश्रय से (वयः) पक्षी (मातुः) अन्तरिक्ष के बीच में (सीम्) सब प्रकार (निरेतवे) निरन्तर जाने आने को समर्थ होते हैं उन वायुओं को आप लोग (अनु) पश्चात् विशेषता से जानिये ॥

 

अन्वयः-

हे मनुष्या एषां यत् स्थिरं जानं शवो बलं द्विता वर्त्तते यदाश्रित्य वयः पक्षिणो मातुरन्तरिक्षस्य मध्ये सीं निरेतवे शक्नुवन्ति तान् भवन्तोनुविजानन्तु ॥

 

 

भावार्थः-

य इमे कार्यवायव आकाशादुत्पद्येतस्ततो गच्छन्त्यागच्छन्ति यत्र यत्रावकाशस्तत्र तत्र येषां सर्वतो गमनं संभवति। सर्वे प्राणिनो याननुजीवनं प्राप्य बलवन्तो भवन्ति तान् युक्त्या यूयं सेवध्वम् ॥

मोक्षमूलरोक्तिः। सत्यमेव वायूनामुत्पत्तिस्तेषां सामर्थ्यं मातुः सकाशादागच्छत्येतेषां सामर्थ्यं द्विगुणं चास्तीति निष्प्रयोजनास्येयं व्याख्यास्ति। कुतः सर्वेषां द्रव्याणामुत्पत्तिः स्वस्वकारणानुकूलत्वेन बलवती जायते तेषां कार्याणां मध्ये कारणगुणा आगच्छन्त्येव वयःशब्देन किल पक्षिणो ग्रहणमस्तीत्यतः ॥

ये कार्यरूप पवन आकाश में उत्पन्न होकर इधर उधर जाते-आते हैं, जहां अवकाश है वहां जिनके सब प्रकार गमन का संभव होता और जिनकी अनुकूलता से सब प्राणी जीवन को प्राप्त होकर बल वाले होते हैं उन को युक्ति के साथ तुम लोग सेवन किया करो ॥ 

मोक्षमूलर की उक्ति है कि सत्य ही है कि पवनों की उत्पत्ति बलवाली तथा उनका सामर्थ्य आकाश से आता है उनका सामर्थ्य द्विगुण वा पुष्कल है। सो यह निष्प्रयोजन है क्योंकि सब द्रव्यों की उत्पत्ति अपने-२ कारण के अनुकूल बलवाली होती है उनके कार्यों में कारण के गुण आते ही हैं और वयः शब्द से पक्षियों का ग्रहण है ॥

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