Rig Veda‎ > ‎Mandal 01‎ > ‎Sukta 037‎ > ‎

Mantra Rig 01.037.004

MANTRA NUMBER:

Mantra 4 of Sukta 37 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 12 of Adhyaya 3 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 24 of Anuvaak 8 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- कण्वो घौरः

देवता (Devataa) :- मरूतः

छन्द: (Chhand) :- गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

प्र व॒: शर्धा॑य॒ घृष्व॑ये त्वे॒षद्यु॑म्नाय शु॒ष्मिणे॑ दे॒वत्तं॒ ब्रह्म॑ गायत

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

प्र वः शर्धाय घृष्वये त्वेषद्युम्नाय शुष्मिणे देवत्तं ब्रह्म गायत

 

The Mantra's transliteration in English

pra va śardhāya ghṛṣvaye tveadyumnāya śumie | devattam brahma gāyata 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

प्र वः॒ शर्धा॑य घृष्व॑ये त्वे॒षऽद्यु॑म्नाय शु॒ष्मिणे॑ दे॒वत्त॑म् ब्रह्म॑ गा॒य॒त॒

 

The Pada Paath - transliteration

pra | va | śardhāya | ghṛṣvaye | tvea-dyumnāya | śumie | devattam | brahma | gāyata 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३।०

मन्त्रविषयः-

पुनरेते वायोः कस्मै प्रयोजनाय किं कुर्युरित्युपदिश्यते।

फिर वे विद्वान् लोग वायु से किस-२ प्रयोजन के लिये क्या-२ करें, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

 

पदार्थः-

(प्र) प्रीतार्थे (वः) युष्माकम् (शर्धाय) बलाय (घृष्वये) घर्षन्ति परस्परं संचूर्णयन्ति येन तस्मै (त्वेषद्युम्नाय) प्रकाशमानाय यशसे द्युम्नं द्योततेर्यशोवान्नं वा। निरु० । (शुष्मिणे) शुष्यति बलयति येन व्यवहारेण स बहुर्विद्यते यस्मिँस्तस्मै। अत्र भूम्न्यर्थं इनिः। (देवत्तम्) यद्वेवेनेश्वरेण दत्तं विद्वद्भिर्वाध्यापकेन तत् (ब्रह्म) वेदम् (गायत) षड्जादि स्वरैरालपत ॥

हे विद्वान् मनुष्यो ! जो ये पवन (वः) तुम लोगों के (शर्धाय) बल प्राप्त करनेवाले (घृष्वये) जिस के लिये परस्पर लड़तें भिड़ते हैं उस (शुष्मिणे) अत्यन्त प्रशंसित बलयुक्त व्यवहार वाले (त्वेषद्युम्नाय) प्रकाशमान यश के लिये हैं तुम लोग उनके नियोग से (देवत्तम्) ईश्वर ने दिये वा विद्वानों नेपढ़ाये हुए (ब्रह्म) वेद को (प्रगायत) अच्छे प्रकार षड्जादि स्वरों से स्तुतिपूर्वक गाया करो ॥

 

अन्वयः-

हे विद्वांसो मनुष्या य इमे वायवः वो युष्माकं शर्धाय घृष्वये शुष्मिणे त्वेषद्युम्नाय सन्ति तन्नियोगेन देवत्तं ब्रह्म यूयं गायत ॥

 

 

भावार्थः-

विद्वद्भिर्मनुष्यैरीश्वरोक्तान् वेदानधीत्य वायु गुणान् विदित्वा यशस्वीनि बलकारकाणि कर्माणि नित्यमनुष्ठाय सर्वेभ्यः प्राणिभ्यः सुखानि देयानीति ॥मोक्षमूलरोक्तिः। येषां गृहेषु वायवो देवता आगच्छन्ति हे कण्वा यूयं तेषामग्रे ता देवता स्तुत। ताः कीदृश्यः संति। उन्मत्ता विजयवत्यो बलवत्यश्च। अत्र। मं० । सू० १७। मं० २। इदमत्रप्रमाणमस्तीत्यशुद्धास्ति। यच्चात्र मंत्रप्रमाणंदत्तं तत्रापि तदभीष्टोर्थो नास्तीत्यतः ॥

विद्वान् मनुष्यों को चाहिये कि ईश्वर के कहे हुए वेदों को पढ़ वायु के गुणों को जान और यश वा बल के कर्मों का अनुष्ठान करके सब प्राणियों के लिये सुख देवें ॥मोक्षमूलर साहिब का अर्थ जिनके घरों में वायु देवता आते हैं हे बुद्धिमान् मनुष्यों तुम उन के आगे उन देवताओं की स्तुति करो तथा देवता कैसे हैं कि उन्मत्त विजय करने वा वेग वाले इस में चौथे मंडल सत्रहवें सूक्त दूसरे मंत्र का प्रमाण है। सो यह अशुद्ध है क्योंकि सब जगह पवनों की स्थिति के जाने आने वाली क्रिया होने वा उनके सामीप्य के विना वायु के गुणों की स्तुति के संभव होने से और वायु से भिन्न वायु का कोई देवता नहीं है इस से तथा जो मंत्र का प्रमाण दिया है वहां भी उनका अभीष्ट अर्थ इनके अर्थ के साथ नहीं है ॥

Comments