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Mantra Rig 01.034.012

MANTRA NUMBER:

Mantra 12 of Sukta 34 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 6 of Varga 5 of Adhyaya 3 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 60 of Anuvaak 7 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- अश्विनौ

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

नो॑ अश्विना त्रि॒वृता॒ रथे॑ना॒र्वाञ्चं॑ र॒यिं व॑हतं सु॒वीर॑म् शृ॒ण्वन्ता॑ वा॒मव॑से जोहवीमि वृ॒धे च॑ नो भवतं॒ वाज॑सातौ

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

नो अश्विना त्रिवृता रथेनार्वाञ्चं रयिं वहतं सुवीरम् शृण्वन्ता वामवसे जोहवीमि वृधे नो भवतं वाजसातौ

 

The Mantra's transliteration in English

ā no aśvinā trivtā rathenārvāñca rayi vahata suvīram | śṛṇvantā vām avase johavīmi vdhe ca no bhavata vājasātau 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

नः॒ अ॒श्वि॒ना॒ त्रि॒ऽवृता॑ रथे॑न अ॒र्वाञ्च॑म् र॒यिम् व॒ह॒त॒म् सु॒ऽवीर॑म् शृ॒ण्वन्ता॑ वा॒म् अव॑से जो॒ह॒वी॒मि॒ वृ॒धे च॒ नः॒ भ॒व॒त॒म् वाज॑ऽसातौ

 

The Pada Paath - transliteration

ā | na | aśvinā | tri-vtā | rathena | arvāñcam | rayim | vahatam | su-vīram | śṛṇvantā | vām | avase | johavīmi | vdhe | ca | na | bhavatam | vāja-sātau 



महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३४।१२

मन्त्रविषयः-

पुनरेताभ्यां किं साधनीयमित्युपदिश्यते।

फिर इनसे क्या सिद्ध करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(आ) समन्तात् (नः) अस्माकम् (अश्विना) जलपवनौ। अत्र सर्वत्र सुपां सुलुग् इत्याकारादेशः। (त्रिवृता) यस्त्रिषु स्थलजलान्तरिक्षेषु पूर्णगत्या गमनाय वर्त्तते तेन (रथेन) विमानादियानस्वरूपेण रमणसाधनेन (अर्वांचम्) अर्वागुपरिष्टादधस्थं स्थानमभीष्टं वांचति येन तम् (रयिम्) चक्रवर्त्तिराज्यसिद्धं धनम् (वहतम्) प्राप्नुतः। अत्र लङर्थे लोट्। (सुवीरम्) शोभनां वीरा यस्य तम् (शृण्वन्ता) शृण्वन्तौ (वाम्) युवयोः (अवसे) रक्षणाय सुखावगमाय विद्यायां प्रवेशाय वा (जोहवीमि) पुनः पुनराददामि (वृधे) वर्द्धनाय। अत्र कृतो बहुलम् इति भावे क्विप्। (च) समुच्चये (नः) अस्मान् (भवतम्) भवतः। अत्र लडर्थे लोट्। (वाजसातौ) सङ्ग्रामे ॥१२॥

हे कारीगरी में चतुरजनो (शृण्वन्ता) श्रवण करानेवाले (अश्विना) दृढ विद्या बल युक्त ! आप दोनों जल और पवन के समान (त्रिवृता) तीन अर्थात् स्थल जल और अन्तरिक्ष में पूर्णगति से जानेके लिये वर्त्तमान (रथेन) विमान आदि यान से (नः) हम लोगों को (अर्वाञ्चम्) ऊपर से नीचे अभीष्ट स्थान को प्राप्त होनेवाले (सुवीरम्) उत्तम वीर युक्त (रयिम्) चक्रवर्त्ति राज्य से सिद्ध हुए धन को (आवहतम्) अच्छे प्रकार प्राप्त होके पहुंचाइये (च) और (नः) हम लोगों के (वाजसातौ) सङ्ग्राम में (वृधे) वृद्धि के अर्थ विजय को प्राप्त करानेवाले (भवतम्) हूजिये जैसे मैं (अवसे) रक्षादि के लिये तुम्हारा (जोहवीमि) वारंवार ग्रहण करता हूं वैसे आप मुझको ग्रहण कीजिये ॥१२॥

 

अन्वयः-

हे शिल्पविद्याविचक्षणौ शृण्वन्ता भावयितारावश्विनौ युवां द्यावापृथिव्यादिकौ द्वाविव त्रिवृता रथेननोस्मानर्वांचं सुवीरं रयिमावहतं प्राप्नुतम् नोऽस्माकं वाजसातौ वृधे वर्द्धनाय च विजयिनौ भवतं यथाहं वामवसे जोहवीमि पुनः पुनराददामि तथा मां गृह्णीतम् ॥१२॥

 

 

भावार्थः-

नैतदश्विसंप्रयोजित रथेन विना कश्चित् स्थलजलान्त रिक्षमार्गान् सुखेन सद्यो गन्तुं शक्नोत्यतो राज्यश्रियमुत्तमां सेनां वीरपुरुषाँश्च संप्राप्येदृशेन यानेन युद्धे विजयं प्राप्तुं शक्नुवंति तस्मादेतस्मिन् मनुष्याः सदा युक्ता भवंत्विति ॥१२॥ 

पूर्वेण सूक्तेनैतद्विद्यासाधकेन्द्रोर्थः प्रतिपादितोऽनेन सूक्तेन ह्येतस्या विद्याया मुख्यौ साधकावश्विनौ द्यावापृथिव्यादिकौ च प्रतिपादितौ स्त इत्येतदर्थस्य पूर्वार्थेन सह सङ्गतिरस्तीति विज्ञेयम्।

इति पञ्चमो वर्गश्चतुस्त्रिंशं सूक्तं च समाप्तम् ॥३

जल अग्नि से प्रयुक्त किये हुए रथ के विना कोई मनुष्य स्थल जल और अन्तरिक्षमार्गों में शीघ्र जानेको समर्थ नहीं हो सकता। इससे राज्यश्री, उत्तम सेना, और वीर पुरुषों को प्राप्त होके ऐसे विमानादि यानों से युद्ध में विजय को पा सकते हैं। इस कारण इस विद्या में मनुष्य सदा युक्त हों ॥१२॥

पूर्व सूक्त से इस विद्या के सिद्ध करनेवाले इन्द्र शब्द के अर्थ का प्रतिपादन किया तथा इस सूक्त से इस विद्या के साधक अश्वि अर्थात् द्यावा पृथिवी आदि अर्थ प्रतिपादन किये हैं इससे इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये। 

यह पांचवां वर्ग और चौतीसवां सूक्त समाप्त हुआ ॥३

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