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Mantra Rig 01.034.011

MANTRA NUMBER:

Mantra 11 of Sukta 34 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 5 of Adhyaya 3 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 59 of Anuvaak 7 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- अश्विनौ

छन्द: (Chhand) :- जगती

स्वर: (Swar) :- निषादः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

ना॑सत्या त्रि॒भिरे॑काद॒शैरि॒ह दे॒वेभि॑र्यातं मधु॒पेय॑मश्विना प्रायु॒स्तारि॑ष्टं॒ नी रपां॑सि मृक्षतं॒ सेध॑तं॒ द्वेषो॒ भव॑तं सचा॒भुवा॑

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

नासत्या त्रिभिरेकादशैरिह देवेभिर्यातं मधुपेयमश्विना प्रायुस्तारिष्टं नी रपांसि मृक्षतं सेधतं द्वेषो भवतं सचाभुवा

 

The Mantra's transliteration in English

ā nāsatyā tribhir ekādaśair iha devebhir yātam madhupeyam aśvinā | prāyus tāriṣṭa nī rapāsi mkata sedhata dveo bhavata sacābhuvā 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

ना॒स॒त्या॒ त्रि॒भिः ए॒का॒द॒शैः इ॒ह दे॒वेभिः॑ या॒त॒म् म॒धु॒ऽपेय॑म् अ॒श्वि॒ना॒ प्र आयुः॑ तारि॑ष्टम् निः रपां॑सि मृ॒क्ष॒त॒म् सेध॑तम् द्वेषः॑ भव॑तम् स॒चा॒ऽभुवा॑

 

The Pada Paath - transliteration

ā | nāsatyā | tribhi | ekādaśai | iha | devebhi | yātam | madhu-peyam | aśvinā | pra | āyu | tāriṣṭam | ni | rapāsi | mkatam | sedhatam | dvea | bhavatam | sacābhuvā 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३४।११

मन्त्रविषयः-

पुनस्ताभ्यां किं किं साधनीयमित्युपदिश्यते।

फिर उनसे क्या-२ सिद्ध करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(आ) समन्तात् (नासत्या) सत्यगुणस्वभावौ। अत्र सर्वत्र सुपां सुलुग् इत्याकारादेशः। (त्रिभिः) एभिरहोरात्रैः समुद्रस्य पारम् (एकादशैः) एभिरहोरात्रैर्भूगोलान्तम् (इह) यानेषु संप्रयोजितौ (देवेभिः) विद्वद्भिः (यातम्) प्राप्नुतम् (मधुपेयम्) मधुभिर्गुणैर्युक्तं पेयं द्रव्यम् (अश्विना) द्यावापृथिव्यादिकौ द्वौ द्वौ (प्र) प्रकृष्टार्थे (आयुः) जीवनम् (तारिष्टम्) अन्तरिक्षं प्लावयतम् (निः) नितराम् (रपांसि) पापानि दुःखप्रदानि। रपोरप्रमिति पापनामनी भवतः। निरु० ४।२१। (मृक्षतम्) दूरीकुरुतम् (सेधतम्) मंगलं सुखं प्राप्नुतम् (द्वेषः) द्विषतः शत्रून्। अन्येभ्योऽपि दृश्यन्त इति कर्तरि विच्। (भवतम्) (सचाभुवा) यौ सचा समवायं भावयतस्तौ। अत्रान्तर्गतो ण्यर्थः ॥११॥

हे शिल्पिलोगो ! तुम दोनों (नासत्या) सत्यगुण स्वभाव युक्त (सचाभुवा) मेल करानेवाले जल और अग्नि के समान (देवेभिः) विद्वानों के साथ (इह) इन उत्तम यानों में बैठ के (त्रिभिः) तीन दिन और तीन रात्रियों में महासमुद्र के पार और (एकादशभिः) ग्यारह दिन और ग्यारह रात्रियों में भूगोल पृथिवी के अन्त को (यातम्) पहुंचो (द्वेषः) शत्रु और (रपांसि) पापों को (निर्मृक्षतम्) अच्छे प्रकार दूर करो (मधुपेयम्) मधुर गुण युक्त पीने योग्य द्रव्य और (आयुः) उमर को (प्रतारिष्टम्) प्रयत्न से बढ़ाओ उत्तम सुखों को (सेधतम्) सिद्ध करो और शत्रुओं को जीतनेवाले (भवतम्) होओ ॥११॥

 

अन्वयः-

हे शिल्पिनौ युवां नासत्याश्विना सचाभुवाविव देवेभिर्विद्वद्भिस्सहेहोत्तसेषु यानेषु स्थित्वा त्रिभिरहोरात्रैर्महासमुद्रस्य पारमेकादशैरहोरात्रैर्भूगोलान्तं यातं द्वेषोरपांसि च निर्मृक्षतं मधुपेयमायुः प्रतारिष्टं सुसुखं सेधतं विजयिनौ भवतम् ॥११॥

 

 

भावार्थः-

यदा मनुष्या ईदृशेषु# स्थित्वा चालयन्ति तदा त्रिभिरहोरात्रैः सुखेन समुद्रपारमेकादशैरहोरात्रैर्भूगोलस्याभितो गन्तुं शक्नुवन्ति। एवं कुर्वन्तो विद्वांसः सुखयुक्तं पूर्णमायुः प्राप्य दुःखानि दूरीकृत्य शत्रून् विजित्य चक्रवर्त्तिराज्य भागिनो भवन्तीति ॥११॥ #[यानेषु।सं]

जब मनुष्य ऐसे यानों में बैठ और उनको चलाते हैं तब तीन दिन और तीन रात्रियों में सुख से समुद्र के पार तथा ग्यारह दिन और ग्यारह रात्रियों में ब्रह्माण्ड के चारों ओर जाने को समर्थ हो सकते हैं इसी प्रकार करते हुए विद्वान् लोग सुखयुक्त पूर्ण आयु को प्राप्त हो दुःखों को दूर और शत्रुओं को जीतकर चक्रवर्त्तिराज्य भोगनेवाले होते हैं ॥११॥

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