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Mantra Rig 01.034.008

MANTRA NUMBER:

Mantra 8 of Sukta 34 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 5 of Adhyaya 3 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 56 of Anuvaak 7 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- अश्विनौ

छन्द: (Chhand) :- निचृज्जगती

स्वर: (Swar) :- निषादः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

त्रिर॑श्विना॒ सिन्धु॑भिः स॒प्तमा॑तृभि॒स्त्रय॑ आहा॒वास्त्रे॒धा ह॒विष्कृ॒तम् ति॒स्रः पृ॑थि॒वीरु॒परि॑ प्र॒वा दि॒वो नाकं॑ रक्षेथे॒ द्युभि॑र॒क्तुभि॑र्हि॒तम्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

त्रिरश्विना सिन्धुभिः सप्तमातृभिस्त्रय आहावास्त्रेधा हविष्कृतम् तिस्रः पृथिवीरुपरि प्रवा दिवो नाकं रक्षेथे द्युभिरक्तुभिर्हितम्

 

The Mantra's transliteration in English

trir aśvinā sindhubhi saptamātbhis traya āhāvās tredhā havi ktam | tisra pthivīr upari pravā divo nāka rakethe dyubhir aktubhir hitam 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

त्रिः आ॒श्वि॒ना॒ सिन्धु॑ऽभिः स॒प्तमा॑तृऽभिः त्रयः॑ आ॒ऽहा॒वाः त्रे॒धा ह॒विः कृ॒तम् ति॒स्रः पृ॒थि॒वीः उ॒परि॑ प्र॒वा दि॒वः नाक॑म् र॒क्षे॒थे॒ इति॑ द्युऽभिः॑ अ॒क्तुऽभिः॑ हि॒तम्

 

The Pada Paath - transliteration

tri | āśvinā | sindhu-bhi | saptamāt-bhi | traya | āhāvā | tredhā | havi | ktam | tisra | pthivī | upari | pravā | diva | nākam | raketheiti | dyu-bhi | aktu-bhi | hitam 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३४।०

मन्त्रविषयः-

पुनस्तौ कीदृशौ ताभ्यां किं किं साध्यमित्युपदिश्यते।

फिर वे कैसे हैं, और उनसे क्या-२ सिद्ध करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(त्रिः) त्रिवारम् (अश्विना) अश्विनौ सूर्य्याचन्द्रमसाविवि। अत्र सर्वत्र सुपां सुलुग् इत्याकारादेशः। (सिन्धुभिः) नदीभिः (सप्तमातृभिः) सप्तार्थात् पृथिव्यग्निसूर्यवायुविद्युदुदकावकाशा मातरो जनका यासां ताभिः (त्रयः) उपर्यधोमध्याख्याः (आहावाः) निपानसदृशा मार्गा जलाधरा वा। निपानमाहावः। अ० ३।३।७४। इति निपातनम्। (त्रेधा) त्रिभिः प्रकारैः (हविः) होतुमर्हं द्रव्यम् (कृतम्) शोधितम् (तिस्रः) स्थूलत्रसरेणुपरमाण्वाख्याः (पृथिवीः) विस्तृताः (उपरि) ऊर्ध्वार्थे (प्रवा) गमयितारौ (दिवः) प्रकाशयुक्तान् किरणान् (नाकम्) अविद्यमानदुःखम् (रक्षेथे) रक्षतम्। अत्र लोडर्थे लङ् व्यत्ययेनात्मनेपदं च (द्युभिः) दिनैः (अक्तुभिः) रात्रिभिः द्युरित्यहर्नामसु पठितम्। निघं० १।७। (हितम्) धृतम् ॥८॥

हे (प्रवा) गमन करानेवाले (अश्विना) सूर्य और वायु के समान कारीगर लोगो ! आप (सप्तमातृभिः) जिनकी सप्त अर्थात् पृथिवी अग्नि सूर्य वायु बिजुली जल और आकाश सात माता के तुल्य उत्पन्न करनेवाले हैं (उन) (सिन्धुभिः) नदियों और (द्युभिः) दिन (अक्तुभिः) रात्रि के साथ जिसके (त्रयः) ऊपर नीचे और मध्य में चलनेवाले (आहावाः) जलाधार मार्ग हैं उस (त्रेधा) तीन प्रकार से (हविष्कृतम्) ग्रहण करने योग्य शोधे हुए (नाकम्) सब दुःखों से रहित (हितम्) स्थित द्रव्य को (उपरि) ऊपर चढ़ा के (तिस्रः) स्थूल त्रसरेणु और परमाणु नाम वाली तीन प्रकार की (पृथिवीः) विस्तार युक्त पृथिवी और (दिवः) प्रकाशस्वरूप किरणों को प्राप्त कराके उसको इधर-उधर चला और नीचे वर्षा के इससे सब जगत् की (त्रिः) तीन बार (रक्षेथे) रक्षा कीजिये ॥८॥

 

अन्वयः-

हे प्रवौ गमयितारावश्विनौ वायुसूर्य्याविव शिल्पिनौ युवां सप्तमातृभिः सिंधुभिर्द्युभिरक्तुभिश्च यस्य त्रय आहावाः सन्ति तत् त्रेधा हविष्कृतं शोधितं नाकं हितं द्रव्यमुपरि प्रक्षिप्य तत् तिस्रः पृथिवीर्दिवः प्रकाशयुक्तान् किरणान् प्रापप्य तदितस्ततश्चालयित्वाधो वर्षयित्वैतेन सर्वं जगत्त्री रक्षेथे त्रिवारं रक्षतम् ॥८॥


 

भावार्थः-

मनुष्यैर्वायुसूर्य्ययोश्छेदनाकर्षणवृष्ट्युद्भावकैर्गुणैर्नद्यश्चलंति हुतं द्रव्यं दुर्गन्धादिदोषान्निवार्य हितं सर्वदुःखरहितं सुखं साधयति यतोऽहर्निशं सुखं वर्द्धते येन विना कश्चित्प्राणी जीवितुं न शक्नोति तस्मादेतच्छोधनार्थं यज्ञाख्यं कर्म नित्यं कर्तव्यमिति ॥८॥

मनुष्यों को योग्य है कि जो सूर्य वायु के छेदन आकर्षण और वृष्टि करानेवाले गुणों से नदियां चलती तथा हवन किया हुआ द्रव्य दुर्गन्धादि दोषों को निवारण कर सब दुःखों से रहित सुखों को सिद्ध करता है जिससे दिन रात सुख बढ़ता है इसके विना कोई प्राणी जीवने को समर्थ नहीं हो सकता इससे इसकी शुद्धि के लिये यज्ञरूप कर्म नित्य करें ॥८॥

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