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Mantra Rig 01.034.006

MANTRA NUMBER:

Mantra 6 of Sukta 34 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 6 of Varga 4 of Adhyaya 3 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 54 of Anuvaak 7 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- अश्विनौ

छन्द: (Chhand) :- विराड्जगती

स्वर: (Swar) :- निषादः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

त्रिर्नो॑ अश्विना दि॒व्यानि॑ भेष॒जा त्रिः पार्थि॑वानि॒ त्रिरु॑ दत्तम॒द्भ्यः ओ॒मानं॑ शं॒योर्मम॑काय सू॒नव॑  त्रि॒धातु॒ शर्म॑ वहतं शुभस्पती

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

त्रिर्नो अश्विना दिव्यानि भेषजा त्रिः पार्थिवानि त्रिरु दत्तमद्भ्यः ओमानं शंयोर्ममकाय सूनवे त्रिधातु शर्म वहतं शुभस्पती

 

The Mantra's transliteration in English

trir no aśvinā divyāni bheajā tri pārthivāni trir u dattam adbhya | omāna śayor mamakāya sūnave tridhātu śarma vahata śubhas patī 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

त्रिः नः॒ अ॒श्वि॒ना॒ दि॒व्यानि॑ भे॒ष॒जा त्रिः पार्थि॑वान् त्रिः ऊँ॒ इति॑ द॒त्त॒म् अ॒त्ऽभ्यः ओ॒मान॑म् श॒म्ऽयोः मम॑काय सू॒नवे॑ त्रि॒ऽधातु॑ शर्म॑ व॒ह॒त॒म् शु॒भः॒ प॒ती॒ इति॑

 

The Pada Paath - transliteration

tri | na | aśvinā | divyāni | bheajā | tri | pārthivān | tri | o iti | dattam | at-bhya | omānam | śam-yo | mamakāya | sūnave | tri-dhātu | śamar | vahatam | śubha | patī 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३४।०

मन्त्रविषयः-

पुनस्ताभ्यां किं कार्यमित्युपदिश्यते।

फिर उनसे क्या करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(त्रिः) त्रिवारम् (नः) अस्मभ्यम् (अश्विना) अश्विनौ विद्याज्योतिर्विस्ता रमयौ (दिव्यानि) विद्यादि शुभगुणप्रकाशकानि (भेषजा) सोमादीन्यौषधानि रसमयानि (त्रिः) त्रिवारम् (पार्थिवानि) पृथिव्याविकारयुक्तानि (त्रिः) त्रिवारम् (ऊँ) वितर्के (दत्तम्) (अद्भ्यः) सातत्यगन्तृभ्यो वायुविद्युदादिभ्यः (ओमानम्) रक्षन्तम् विद्याप्रवेशकं क्रियागमकं व्यवहारम्। अत्रावधातोः। अन्येभ्योपि दृश्यन्त इति मनिन्। (शंयोः) शं सुखं कल्याणं विद्यते यस्मिँस्तस्य (ममकाय) ममायं ममकस्तस्मै। अत्र संज्ञापूर्वको विधिरनित्यः। अ० ।१४६। इति वृद्ध्यभावः (सूनवे) औरसाय विद्यापुत्राय वा (त्रिधातु) त्रयोयस्ताम्रपित्तलानि धातवे यस्मिन् भूसमुद्रान्तरिक्षगमनार्थे याने तत (शर्म) गृहस्वरूपं सुखकारकं वा। शर्मेति गृहनामसु पठितम्। निघं० ३।। (वहतम्) प्रापयतम् (शुभः) यत् कल्याणकारकं मनुष्याणां कर्म तस्य। अत्र संपदादित्वात् क्विप्। (पती) पालयितारौ। पष्ठ्याःपतिपुत्र०। अ० ।३।३। इति संहितायां विसर्जनीयस्य सकारादेशः ॥६॥ [अनया परिभाषया। सं०] [शुभ् शब्दस्य। सं०]

हे (शुभस्पती) कल्याणकारक मनुष्यों के कर्मों की पालना करने और (अश्विना) विद्या की ज्योति को बढ़ानेवाले शिल्पि लोगो ! आप दोनों (नः) हम लोगों के लिये (अद्भ्यः) जलों से (दिव्यानि) विद्यादि उत्तम गुण प्रकाश करनेवाले (भेषजा) रसमय सोमादि ओषधियों को (त्रिः) तीनताप निवारणार्थ (दत्तम्) दीजिये (उ) और (पर्थिवानि) पृथिवी के विकार युक्त ओषधी (त्रिः) तीन प्रकार से दीजिये और (ममकाय) मेरे (सूनवे) औरस अथवा विद्यापुत्र के लिये (शंयोः) सुख तथा (ओमानम्) विद्या में प्रवेश और क्रिया के बोध करानेवाले रक्षणीय व्यवहार को (त्रिः) तीन बार कीजिये और (त्रिधातु) लोहा ताँबा पीतल इन तीन धातुओं के सहित भूजल और अन्तरिक्ष में जानेवाले (शर्म) गृहस्वरूप यान को मेरे पुत्र के लिये (त्रिः) तीन बार (वहतम्) पहुंचाइये ॥६॥

 

अन्वयः-

हे शुभस्पती अश्विनौ युवां नोऽस्मभ्यमद्भ्यो दिव्यानि भेषजौषधानि त्रिर्दत्तं ऊँइति वितर्के पार्थिवानि भेषजौषधानि त्रिर्दत्तं ममकाय सूनवे शंयोः सुखस्यदानमोमानं च त्रिर्दत्तं त्रिधातु शर्म ममकाय सूनवे त्रिर्वहतं प्रापयतम् ॥६॥

 

 

भावार्थः-

मनुष्यैर्जलपृथिव्योर्मध्ये यानि रोगनाशकान्यौषधानि संति तानि त्रिविधतापनिवारणाय भोक्तव्यान्यनेक धातुकाष्ठमयं गृहाकारं यानं रचयित्वा तत्रोत्तमानि यवादीन्यौषधानि संस्थाप्याग्निगृहेग्नि पार्थिवैरिंधनैः प्रज्वाल्यापः स्थापयित्वा बाष्पबलेन यानानि चालयित्वा व्यवहारार्थं देशदेशान्तरं गत्वा तत आगत्य सद्यः स्वदेशः प्राप्तव्य एवं कृते महांति सुखानि प्राप्तानि भवन्तीति ॥६॥ 

इति चतुर्थो वर्गः ॥४॥

मनुष्यों को चाहिये कि जो जल और पृथिवी में उत्पन्न हुई रोग नष्ट करनेवाली औषधी हैं उनका एक दिन में तीन बार भोजन किया करें और अनेक धातुओं से युक्त काष्ठमय घर के समान यान को बना उसमें उत्तम-२ जव आदि औषधी स्थापन अग्नि के घर में अग्नि को काष्ठों से प्रज्वलित जल के घर में जलों को स्थापन भाफ के बल से यानों को चला व्यवहार के लिये देशदेशान्तरों को जा और वहां से आकर जल्दी अपने देश को प्राप्त हों इस प्रकार करने से बड़े-२ सुख प्राप्त होते हैं ॥६॥ 

यह चौथा वर्ग समाप्त हुआ ॥४॥

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