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Mantra Rig 01.034.005

MANTRA NUMBER:

Mantra 5 of Sukta 34 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 4 of Adhyaya 3 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 53 of Anuvaak 7 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- अश्विनौ

छन्द: (Chhand) :- जगती

स्वर: (Swar) :- निषादः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

त्रिर्नो॑ र॒यिं व॑हतमश्विना यु॒वं त्रिर्दे॒वता॑ता॒ त्रिरु॒ताव॑तं॒ धिय॑: त्रिः सौ॑भग॒त्वं त्रिरु॒त श्रवां॑सि नस्त्रि॒ष्ठं वां॒ सूरे॑ दुहि॒ता रु॑ह॒द्रथ॑म्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

त्रिर्नो रयिं वहतमश्विना युवं त्रिर्देवताता त्रिरुतावतं धियः त्रिः सौभगत्वं त्रिरुत श्रवांसि नस्त्रिष्ठं वां सूरे दुहिता रुहद्रथम्

 

The Mantra's transliteration in English

trir no rayi vahatam aśvinā yuva trir devatātā trir utāvata dhiya | tri saubhagatva trir uta śravāsi nas triṣṭha sūre duhitā ruhad ratham 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

त्रिः नः॑ र॒यिम् व॒ह॒त॒म् अ॒श्वि॒ना॒ यु॒वम् त्रिः दे॒वता॑ता त्रिः उ॒त अ॒व॒त॒म् धियः॑ त्रिः सौ॒भ॒ग॒ऽत्वम् त्रिः उ॒त श्रवां॑सि नः॒ त्रिः॒ऽस्थम् वा॒म् सूरे॑ दु॒हि॒ता रु॒ह॒त् रथ॑म्

 

The Pada Paath - transliteration

tri | na | rayim | vahatam | aśvinā | yuvam | tri | devatātā | tri | uta | avatam | dhiya | tri | saubhaga-tvam | tri | uta | śravāsi | na | tri-stham | vām | sūre | duhitā | ruhat | ratham 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३४।०

मन्त्रविषयः-

पुनस्तौ किं साधकावित्युपदिश्यते।

फिर वे किस कार्य के साधक हैं, इस विषय का उपदेश अगले मंत्र में किया है।

 

पदार्थः-

(त्रिः) त्रिवारं विद्याराज्यश्रीप्राप्तिरक्षणक्रियामयम् (नः) अस्मान् (रयिम्) परमोत्तमं धनम् (वहतम्) प्रापयतम् (अश्विना) द्यावापृथिव्यादिसंज्ञकाविव। अत्र सुपां सुलुग् इत्याकारादेशः। (युवम्) युवाम् (त्रिः) त्रिवारं प्रेरकसाधक क्रियाजन्यम्। (देवताता) शिल्पक्रियायज्ञसंपत्तिहेतू यद्वा देवान् विदुषो दिव्यगुणान्वा तनुतस्तौ। अत्र दुतनिभ्यां दीर्घश्च। उ० ३।८८# इति क्तः प्रत्ययः। देवतातेति यज्ञनामसु पठितम्। निघं० ३।१। (त्रिः) त्रिवारं शरीरप्राणमनोभी रक्षणम् (उत) अपि (अवतम्) प्रविशतम् (धियः) धारणावतीर्बुद्धीः (त्रिः) त्रिवारं भृत्यसेनास्वात्मभार्यादिशिक्षाकरणम् (सौभगत्वम्) शोभना भगा ऐश्वर्याणि यस्मात् पुरुषार्थात्तस्येदं* सौभगं तस्य भावः¤ सौभगत्वम् (त्रिः) त्रिवारंश्रवणमनननिदिध्यासनकरणम् (उत) अपि (श्रवांसि) श्रूयन्ते यानि तानि वेदादिशास्त्रश्रवणानि धनानि वा। श्रव इति धननामसु पठितम्। निघं० २।१०। (नः) अस्माकम् (त्रिस्थम्) त्रिषु शरीरात्ममनस्सुखेषु तिष्ठतीति त्रिस्थम् (वाम्) तयोः (सूरे) सूर्यस्य। अत्र सुपां सुलुग् इति शे आदेशः। (दुहिता) कन्येव। दुहिता दुर्हिता दूरे हिता दोग्धेर्वा। निरु० ३।। (आ) समंतात् (रुहत्) रोहेत्। अत्रकृमृहरुहिभ्यश्छन्दसि इति च्लेरङ्। बहुलं छन्दस्य माङ्योगेपि इत्यडभावो लङर्थे लुङ्। च (रथम्) रमन्ते येन तं विमानादियानसमूहम् ॥५॥ #[उ० ३।९०।] *[तस्येदम्।अ० ४।३।१२०। इत्यण् प्र०।] ¤[तस्य भवस्त्वतलौ। अ० ५।५।११९। इति ‘त्व’ प्र०] ‡[रोहति,सं०।] [अ० ३।१।५९।] [अ० ६।४।७५।]

हे (देवताता) शिल्प क्रिया और यज्ञ संपत्ति के मुख्य कारण वा विद्वान् तथा शुभगुणों के बढ़ाने और (अश्विना) आकाश पृथिवी के तुल्य प्राणियों को सुख देनेवाले विद्वान् लोगो ! (युवम्) आप (नः) हम लोगों के लिये (रयिम्) उत्तम धन (त्रिः) तीन बार अर्थात् विद्या राज्य श्री की प्राप्ति और रक्षण क्रियारूप ऐश्वर्य्य को (वहतम्) प्राप्त करो (नः) हम लोगों की (धियः) बुद्धियों (उत) और बल को (त्रिः) तीन बार (अवतम्) प्रवेश कराइये (नः) हम लोगों के लिये (त्रिष्ठम्) तीन अर्थात् शरीर आत्मा और मन के सुख में रहने और (सौभगत्वम्) उत्तम ऐश्वर्य्य के उत्पन्न करनेवाले पुरुषार्थ को (त्रिः) तीन अर्थात् भृत्य, संतान और स्वात्म भार्यादि को प्राप्त कीजिये (उत) और (श्रवांसि) वेदादि शास्त्र वा धनों को (त्रिः) शरीर प्राण और मन की रक्षा सहित प्राप्त करते और (वाम्) जिन अश्वियों के सकाश से (सूरेः) सूर्य की (दुहिता) पुत्री के समान कान्ति (नः) हम लोगों के (रथम्) विमानादि यानसमूह को (त्रिः) तीन अर्थात् प्रेरक साधक और चाकन क्रिया से (आरुहत्) ले जाती है उन दोनों को हम लोग शिल्प कार्यों में अच्छे प्रकार युक्त करें ॥५॥

 

अन्वयः-

हे देवतातावश्विनौ युवं युवां नोस्मभ्यं रयिं त्रिर्वहतं नोस्माकं धियो बुद्धीरुतापि बलं त्रिरवतं नोस्मभ्यं त्रिस्थं सौभगत्वं त्रिर्वहतं प्राप्नुतमुतापि श्रवांसि त्रिर्वहतं प्राप्नुतं वां ययोरश्विनोः सूरे दुहिता पुत्रो वसुविद्यया नोस्माकं रथं त्रिरारुहत् त्रिवारमारोहेत् तौ वयं शिल्पकार्येषु संप्रयुज्महे ॥५॥

 

 

भावार्थः-

मनुष्यैरश्विनोः सकाशाच्छिल्पकार्याणि निर्वर्त्य बुद्धिं वर्धयित्वा सौभाग्यमुत्तमान्नादीनि च प्रापणीयानि तत्सिद्धयानेषु स्थित्वा देशदेशान्तरान् गत्वा व्यवहारेण धनं प्राप्य सदानंदयितव्यमिति ॥५॥

मनुष्यों को उचित है कि अग्नि भूमि के अवलंब से शिल्प कार्यों की सिद्ध और बुद्धि बढ़ाकर सौभाग्य और उत्तम अन्नादि पदार्थों को प्राप्त हो इस सब सामग्री से सिद्ध हुए यानों में बैठ के देश देशान्तरों को जा-आ और व्यवहार द्वारा धन को बढ़ाकर सब काल में आनन्द में रहें ॥५॥

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