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Mantra Rig01.034.004

MANTRA NUMBER:

Mantra 4 of Sukta 34 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 4 of Adhyaya 3 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 52 of Anuvaak 7 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- अश्विनौ

छन्द: (Chhand) :- भुरिक्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

त्रिर्व॒र्तिर्या॑तं॒ त्रिरनु॑व्रते ज॒ने त्रिः सु॑प्रा॒व्ये॑ त्रे॒धेव॑ शिक्षतम् त्रिर्ना॒न्द्यं॑ वहतमश्विना यु॒वं त्रिः पृक्षो॑ अ॒स्मे अ॒क्षरे॑व पिन्वतम्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

त्रिर्वर्तिर्यातं त्रिरनुव्रते जने त्रिः सुप्राव्ये त्रेधेव शिक्षतम् त्रिर्नान्द्यं वहतमश्विना युवं त्रिः पृक्षो अस्मे अक्षरेव पिन्वतम्

 

The Mantra's transliteration in English

trir vartir yāta trir anuvrate jane tri suprāvye tredheva śikatam | trir nāndya vahatam aśvinā yuva tri pko asme akareva pinvatam 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

त्रिः व॒र्तिः या॒त॒म् त्रिः अनु॑ऽव्रते जने॑ त्रिः सु॒प्र॒ऽअ॒व्ये॑ त्रे॒धाऽइ॑व शि॒क्ष॒त॒म् त्रिः ना॒न्द्य॑म् व॒ह॒त॒म् अ॒श्वि॒ना॒ यु॒वम् त्रिः पृक्षः॑ अ॒स्मे इति॑ अ॒क्षरा॑ऽइव पि॒न्व॒त॒म्

 

The Pada Paath - transliteration

tri | varti | yātam | tri | anu-vrate | jane | tri | supra-avye | tredhāiva | śikatam | tri | nāndyam | vahatam | aśvinā | yuvam | tri | pka | asme iti | akarāiva | pinvatam 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३४।०

मन्त्रविषयः-

पुनस्ताभ्यां किं कार्यं कर्त्तव्यमित्युपदिश्यते।

फिर उनसे क्या कार्य करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(त्रिः) त्रिवारम् (वर्त्तिः) वर्त्तन्ते व्यवहरन्ति यस्मिन्मार्गे हृपिषिरुहिवृति। उ० ।१२#। इत्यधिकरण इप्रत्ययः। अत्र सुपां सुलुग् इति द्वितीयैकवचनस्य स्थाने सोरादेशः। (यातम्) प्रापयतम् (त्रिः) त्रिवारम् (अनुव्रते) अनुकूलं सत्याचरणं व्रतं यस्य तस्मिन् (जने) यो जनयति बुद्धिं तस्मिन्। अत्र पचाद्यच्। (त्रिः) त्रिवारम् (सुप्राव्ये) सुष्ठु प्रकृष्टमवितुं प्रवेशितुं योग्यस्तस्मिन् अत्र वाच्छन्दसि सर्वे० इति वृद्धिनिरोधः। (त्रेधेव) यथा त्रिभिः पाठनज्ञापनहस्तक्रियादिभिः प्रकारैस्तथा। इवेन सह नित्यसमासो विभक्त्यलोपः पूर्वपदप्रकृतिस्वरत्वं च*। अ० २।१।। अत्र सायणाचार्य्येण त्रेधैव त्रिभिरेवप्रकारैरित्येवशब्दोशुद्धो व्याख्यातः पदपाठ इव शब्दस्य प्रत्यक्षत्वात्। (शिक्षतम्) सुशिक्षया विद्यां ग्राहयतम् (त्रिः) त्रिवारम् (नान्द्यम्) नंदयितुं समर्धयितुं योग्यं शिल्पज्ञानम् (वहतम्) प्रापयतम् (अश्विना) विद्यादाताग्रहीतारावध्वर्यू (युवम्) युवाम् (त्रिः) त्रिवारम् (पृक्षः) पृंक्ते येन तत्। अत्र पृचीधातोः सर्वधातुभ्योऽसुन्। बाहुलकात्सुडागमश्च। (अस्मे) अस्मान् (अक्षरेव) यथाऽक्षराणि जलानि तथा। अत्र शेश्छन्दसि इति शेर्लोपः। अक्षरमित्युदकनामसु पठितम्। निघं० १।१२। (पिन्वतम्) प्रापयतम् ॥४॥ #[उ० ४।११९।] *[वार्तिकमिदम्। सं०]

हे (अश्विना) विद्या देने वा ग्रहण करनेवाले विद्वान् मनुष्यो ! (युवम्) तुम दोनों (अस्मे) हम लोगों के (वर्त्तिः) मार्ग को (त्रिः) तीन बार (यातम्) प्राप्त हुआ करो। तथा (सुप्राव्ये) अच्छे प्रकार प्रवेश करने योग्य (अनुव्रते) जिसके अनुकूल सत्याचरण व्रत है उस (जने) बुद्धि के उत्पादन करनेवाले मनुष्य के निमित्त (त्रिः) तीन बार (यातम्) प्राप्त हूजिये और शिष्य के लिये (त्रेधेव) तीन प्रकार अर्थात् हस्तक्रिया रक्षा और यान चालन के ज्ञान को शिक्षा करते हुए अध्यापक के समान (अस्मे) हम लोगों को (त्रिः) तीन बार (शिक्षतम्) शिक्षा और (नाद्यम्) समृद्धि होने योग्य शिल्प ज्ञान को (त्रिः) तीन बार (वहतम्) प्राप्त करो और (अक्षरेव) जैसे नदी तलाब और समुद्र आदि जलाशय मेघ के सकाश से जल को प्राप्त होते हैं वैसे हम लोगों को (पृक्षः) विद्यासंपर्क को (त्रिः) तीन बार (पिन्वतम्) प्राप्त करो ॥४॥

 

अन्वयः-

हे अश्विना युवं युवामस्मे अस्माकं वर्त्तिर्मार्गं त्रिर्यातम् तथा सुप्राव्येऽनुव्रते जने त्रिर्यातं त्रिवारं प्रापयतम् शिष्याय त्रेधा हस्तक्रियारक्षणचालनज्ञानाढ्यां शिक्षन्नध्यापक इवास्मान् त्रिः शिक्षतमस्मान्नांद्यं त्रिर्वहतं त्रिवारं प्रापयतम् यथा नदीतड़ागसमुद्रादयो जलाशया मेघस्य सकाशादक्षराणि जलानि व्याप्नुवन्ति तथाऽस्मान् पृक्षो विद्यासंपर्क त्रिः पिन्वतम् ॥४॥

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमालंकारौ। शिल्पविद्याविदां योग्यतास्ति विद्यां चिकीर्षूननुकूलान् बुद्धिमतो जनान् हस्तक्रियाविद्यां पाठयित्वा पुनः पुनः सुशिक्ष्य कार्यसाधनसमर्थान् संपादयेयुः। ते चैतां संपाद्य यथावच्चातुर्यपुरुषार्थाभ्यां बहून् सुखोपकारान् गृह्णीयुः ॥४॥

इस मंत्र में दो उपमालंकार हैं। शिल्प विद्या के जाननेवाले मनुष्यों को योग्य है कि विद्या की इच्छा करनेवाले अनुकूल बुद्धिमान मनुष्यों को पदार्थ विद्या पढ़ा और उत्तम-२ शिक्षा बार-२ देकर कार्यों को सिद्ध करने में समर्थ करें और उनको भी चाहिये कि इस विद्या को संपादन करके यथावत् चतुराई और पुरुषार्थ से सुखों के उपकारों को ग्रहण करें ॥४॥

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