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Mantra Rig 01.033.015

MANTRA NUMBER:

Mantra 15 of Sukta 33 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 3 of Adhyaya 3 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 48 of Anuvaak 7 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- भुरिक्पङ्क्ति

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

आव॒: शमं॑ वृष॒भं तुग्र्या॑सु क्षेत्रजे॒षे म॑घव॒ञ्छ्वित्र्यं॒ गाम् ज्योक्चि॒दत्र॑ तस्थि॒वांसो॑ अक्रञ्छत्रूय॒तामध॑रा॒ वेद॑नाकः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

आवः शमं वृषभं तुग्र्यासु क्षेत्रजेषे मघवञ्छ्वित्र्यं गाम् ज्योक्चिदत्र तस्थिवांसो अक्रञ्छत्रूयतामधरा वेदनाकः

 

The Mantra's transliteration in English

āva śama vṛṣabha tugryāsu ketrajee maghavañ chvitrya gām | jyok cid atra tasthivāso akrañ chatrūyatām adharā vedanāka 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

आवः॑ शम॑म् वृ॒ष॒भम् तुग्र्या॑सु क्षे॒त्र॒ऽजे॒षे म॒घ॒ऽव॒न् श्वित्र्य॑म् गाम् ज्योक् चि॒त् अत्र॑ त॒स्थि॒ऽवांसः॑ अ॒क्र॒न् श॒त्रु॒ऽय॒ताम् अध॑रा वेद॑ना अ॒क॒रित्य॑कः

 

The Pada Paath - transliteration

āva | śamam | vṛṣabham | tugryāsu | ketra-jee | magha-van | śvitryam | gām | jyok | cit | atra | tasthi-vāsa | akran | śatru-yatām | adharā | vedanā | akar ity akaḥ 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३३।१५

मन्त्रविषयः-

पुनरिन्द्रस्य किं कृत्यमित्युपदिश्यते।

फिर इन्द्र का क्या कृत्य है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(आवः) प्रापय (शमम्) शाम्यन्ति येन तम् (वृषभम्) वर्षणशीलं मेघम् (तुग्य्रासु) अप्सु हिंसनक्रियासु (क्षेत्रजेषे) क्षेत्रमन्नादिसहितं भूमिराज्यं जेषते प्रापयति तस्मै। अत्र अन्तर्गतो ण्यर्थः क्विबुपपदसमासश्च। (मघवन्) महाधन सभाध्यक्ष (श्वित्र्यम्) श्वित्रायां भूमेरावरणे साधु (गाम्) ज्योतिः पृथिवीं वा (ज्योक्) निरन्तरे (चित्) उपमार्थे (अत्र) अप्सु भूमौ वा (तस्थिवांसः) तिष्ठन्तः (अक्रन्) कुर्वन्ति। मन्त्रे घस#ह्वरणश० इत्यादिना च्लेर्लुक्। (शत्रूयताम्) शत्रुरिवाचरताम् (अधरा) नीचानि (वेदना) वेदनानि अत्रोभयत्र शे*श्छन्दसि बहुलम् इति शेर्ल्लोपः। (अकः) करोति। अत्र लडर्थे लुङ् ॥१५॥ #[अ० २।४।८०।] *[अ० ६।१।७०।]

हे (मघवन्) बड़े धन के हेतु सभा के स्वामी ! आप जैसे सूर्यलोक (क्षेत्रजेषे) अन्नादि सहित पृथिवी राज्य को प्राप्त कराने के लिये (श्वित्र्यम्) भूमि के ढांप लेने में कुशल (वृषभम्) वर्षण स्वभाव वाले मेघ के (तुग्य्रासु) जलों में (गाम्) किरण समूह को (आवः) प्रवेश करता हुआ (शत्रूयताम्) शत्रु के समान आचरण करनेवाले उन मेघावयवों के (अधरा) नीचे के (वेदना) दुष्टों को वेदनारूप पापफलों को (तस्थिवांसः) स्थापित हुए किरणें छेदन (ज्योक्) निरन्तर (अक्रन्) करते हैं (अत्र) और फिर इस भूमि में वह मेघ (अकः) गमन करता है उसके (चित्) समान शत्रुओं का निवारण और प्रजा को सुख दिया कीजिये ॥१५॥

 

अन्वयः-

हे मघवन् सभेश त्वं यथा सूर्यः क्षेत्रजेषे श्वित्र्यं वृषभं तुग्य्रास्वप्सु गां किरणसमूहभावः प्रवेशयति शत्रूयतां तेषां मेघावयवानामधरा नीचानि वेदना वेदनानि पापफलानि दुःखानि तस्थिवांसः किरणाश्छेदनं ज्योगक्रन्। अत्र भूमौ निपातनमकः क्षेत्रजेषे आसु क्रियासु श्वित्र्यं वृषभं शमभावः शांतिं प्रापयति गां पृथिवीभावः दुःखान्यक्रंश्चिदिव शत्रून्निवार्य प्रजाः सदा सुखय ॥१५॥

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा सूर्य्योन्तरिक्षान्मेघजलं भूमौ निपात्य प्राणिभ्यः शमं सुखं ददाति तथैव सेनाध्यक्षादयो मनुष्या दुष्टान् शत्रून् बध्वा धार्मिकान् पालयित्वा सततं सुखानि भुंजीरन्निति ॥१५॥

पूर्वसूक्तार्थेन सहात्र सूर्यमेघयुद्धार्थवर्णनेनोपमानोपमेयालंकारेण मनुष्येभ्यो युद्धविद्योपदेशार्थस्यैतत्सूक्तार्थस्य संगतिरस्तीति बोध्यम्। 

इति तृतीयो वर्गस्त्रयस्त्रिंशं सूक्तं च समाप्तम् ॥३३॥

इस मंत्र में उपमालंकार है। जैसे सूर्य अन्तरिक्ष से मेघ के जल को भूमि पर गिरा के सब प्राणियों के लिये सुख देता है वैसे सेनाध्यक्षादि लोग दुष्ट मनुष्य शत्रुओं को बांधकर धार्मिक मनुष्यों की रक्षा करके सुखों का भोग करें और करावें ॥१५॥

इस सूक्त में सूर्य मेघ के युद्धार्थ के वर्णन तथा उपमान उपमेय अलंकार वा मनुष्यों के युद्धविद्या के उपदेश करने से पिछले सूक्तार्थ के साथ इस सूक्तार्थ की संगति जाननी चाहिये। 

यह तीसरा वर्ग ३ तैतीसवां सूक्त समाप्त हुआ ॥३३॥

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