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Mantra Rig 01.033.014

MANTRA NUMBER:

Mantra 14 of Sukta 33 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 3 of Adhyaya 3 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 47 of Anuvaak 7 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- भुरिक्पङ्क्ति

स्वर: (Swar) :- पञ्चमः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

आव॒: कुत्स॑मिन्द्र॒ यस्मि॑ञ्चा॒कन्प्रावो॒ युध्य॑न्तं वृष॒भं दश॑द्युम् श॒फच्यु॑तो रे॒णुर्न॑क्षत॒ द्यामुच्छ्वै॑त्रे॒यो नृ॒षाह्या॑य तस्थौ

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

आवः कुत्समिन्द्र यस्मिञ्चाकन्प्रावो युध्यन्तं वृषभं दशद्युम् शफच्युतो रेणुर्नक्षत द्यामुच्छ्वैत्रेयो नृषाह्याय तस्थौ

 

The Mantra's transliteration in English

āva kutsam indra yasmiñ cākan prāvo yudhyanta vṛṣabha daśadyum | śaphacyuto reur nakata dyām uc chvaitreyo nṛṣāhyāya tasthau 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

आवः॑ कुत्स॑म् इ॒न्द्र॒ यस्मि॑न् चा॒कन् प्र आ॒वः॒ युध्य॑न्तम् वृ॒ष॒भम् दश॑ऽद्युम् श॒फऽच्यु॑तः रे॒णुः न॒क्ष॒त॒ द्याम् उत् श्वै॒त्रे॒यः नृ॒ऽसह्या॑य त॒स्थौ॒

 

The Pada Paath - transliteration

āva | kutsam | indra | yasmin | cākan | pra | āva | yudhyantam | vṛṣabham | daśa-dyum | śapha-cyuta | reu | nakata | dyām | ut | śvaitreya | n-sahyāya | tasthau 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३३।१४

मन्त्रविषयः-

पुनरिन्द्रकृत्यमुपदिश्यते।

फिर अगले मन्त्र में इन्द्र के कृत्य का उपदेश किया है।

 

पदार्थः-

(आवः) रक्षेत्। अत्र लिङर्थे लङ्#। (कुत्सम्) वज्रम्। कुत्स इति वज्रनामसु पठितम्। निघं० २।२०। सायणाचार्येणात्र भ्रांत्या कुत्सगोत्रोत्पन्नऋषिर्गृहीतोसंभवादिदं व्याख्यानमयुद्धम् (इन्द्र) सुशील सभाध्यक्ष (यस्मिन्) युद्धे (चाकन्) चंकन्यते काम्यत इति चाकन्। कनी दीप्तिकांतिगतिषु। इत्यस्य यङ्लुगन्तस्य क्विवन्तं रूपम्। वाच्छन्दसि सर्वे विधयो भवन्ति इति नुगभावः। दीर्घो*कित इत्यभ्यासस्य दीर्घत्वं च। सायणाचार्येणेदं भ्रमतो मित्संज्ञकस्य ण्यन्तस्य च कनीधातो रूपमशुद्धं व्याख्यातम् (प्र) प्रकृष्टार्थे (आवः) प्राणिनः सुखे प्रवेशयेत्। अत्र लिङर्थे लङ्। (युध्यन्तम्) युद्धेप्रवर्त्तमानम् (वृषभम्) प्रबलं (दशद्युम्) दशसु दिक्षु द्योतते तम् (शफच्युतः) शफेषु गवादिखुरचिन्हेषु च्युतः पतित आसिक्तो यः सः (रेणुः) धूलिः (नक्षत) प्राप्नोति। अत्र अडभावो व्यत्ययेनात्मनेपदम्। णक्षगताविति प्राप्त्यर्थस्य रूपम् (द्याम्) प्रकाशसमूहं द्युलोकम् (उत्) उत्कृष्टार्थे (श्वैत्रेयः) श्वित्राया आवर्णकर्त्र्या भूमेरपत्यं श्वैत्रेयः (नृसाह्याय) नॄणां सहायाय। अत्रान्येषामपि इति दीर्घः। (तस्थौ) तिष्ठेत्। अत्र लिङर्थे लिट् ॥१४॥ #[लुङ्।सं०] *[अ० ७।४।८३।]

हे इन्द्र सभापते ! जैसे सूर्यलोक (यस्मिन्) जिस युद्ध में (युध्यन्तम्) युद्ध करते हुए (वृषभम्) वृष्टि के करानेवाले (दशद्युम्) दशदिशाओं में प्रकाशमान मेघ के प्रति (कुत्सम्) वज्रमार के जगत् की (प्रावः) रक्षा करता है और (श्वैत्रेयः) भूमि का पुत्र मेघ (शफच्युतः) गौ आदि पशुओं के खुरों के चिन्हों में गिरी हुई (रेणुः) धूलि (द्याम्) प्रकाश युक्त लोक को (नक्षत) प्राप्त होती है उसको (नृसाह्याय) मनुष्यों के लिये (चाकन्) वह कान्ति वाला (उत्तस्थौ) उठता और सुखों को देता है वैसे सभा सहित आपको प्रजा के पालन में यत्न करना चाहिये ॥१४॥

 

अन्वयः-

हे इन्द्र भवता यथा सूर्यलोको यस्मिन् युद्धे युध्यन्तं वृषभं दशद्युं वृत्रं प्रति कुत्सं वज्रं प्रहृत्य जगत्प्रावः श्वैत्रेयो मेघः शफच्युतो रेणुश्च द्यां नक्षत प्राप्नोति नृषाह्याय चाकन्नुत्तस्थौ सुखान्यावऽप्रापयति तथा ससभेन राज्ञा प्रयतितव्यम् ॥१४॥

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालंकारः। यथा सूर्यः स्वकिरणैर्वृत्रं भूमौ निपात्य सर्वान्प्राणिनः सुखयति तथा हे सेनाध्यक्ष त्वमपि सेनाशिक्षाशस्त्रबलेन शत्रून्नस्तव्यस्तान्नधो निपात्य सततं प्रजा रक्षेति ॥१४॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। जैसे सूर्यलोक अपनी किरणों से पृथिवी में मेघ को गिराकर सब प्राणियों को सुखयुक्त करता है वैसे ही हे सभाध्यक्ष तूं भी सेना शिक्षा और शस्त्र बल से शत्रुओं को अस्त व्यस्त कर नीचे गिरा के प्रजा की रक्षा निरन्तर किया कर ॥१४॥

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