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Mantra Rig 01.033.010

MANTRA NUMBER:

Mantra 10 of Sukta 33 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 2 of Adhyaya 3 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 43 of Anuvaak 7 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

ये दि॒वः पृ॑थि॒व्या अन्त॑मा॒पुर्न मा॒याभि॑र्धन॒दां प॒र्यभू॑वन् युजं॒ वज्रं॑ वृष॒भश्च॑क्र॒ इन्द्रो॒ निर्ज्योति॑षा॒ तम॑सो॒ गा अ॑दुक्षत्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

ये दिवः पृथिव्या अन्तमापुर्न मायाभिर्धनदां पर्यभूवन् युजं वज्रं वृषभश्चक्र इन्द्रो निर्ज्योतिषा तमसो गा अदुक्षत्

 

The Mantra's transliteration in English

na ye diva pthivyā antam āpur na māyābhir dhanadām paryabhūvan | yuja vajra vṛṣabhaś cakra indro nir jyotiā tamaso gā adukat 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

ये दि॒वः पृ॒थि॒व्याः अन्त॑म् आ॒पुः मा॒याभिः॑ ध॒न॒ऽदाम् प॒रि॒ऽअभू॑वन् युज॑म् वज्र॑म् वृ॒ष॒भः च॒क्रे॒ इन्द्रः॑ निः ज्योति॑षा तम॑सः गाः अ॒धु॒क्ष॒त्

 

The Pada Paath - transliteration

na | ye | diva | pthivyā | antam | āpu | na | māyābhi | dhana-dām | pari-abhūvan | yujam | vajram | vṛṣabha | cakre | indra | ni | jyotiā | tamasa | gā | adhukat 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३३।१०

मन्त्रविषयः-

पुनरिन्द्रकर्माण्युपदिश्यन्ते।

फिर अगले मन्त्र में इन्द्र के कर्मों का उपदेश किया है।

 

पदार्थः-

(न) निषेधार्थे (ये) मेघावयवघनवद्दस्य्वादयः# शत्रवः (दिवः) सूर्यप्रकाशस्येव न्यायबलपराक्रमदीप्तेः। (पृथिव्याः) पृथिवीलोकस्यान्तरिक्षस्येव पृथिवीराज्यस्य। पृथिवीत्यन्तरिक्षनामसु पठितम्। निघं० १।३। पदनामसु च। निघं० ।३। अनेन सुखप्राप्तिहेतुसार्वभौमराज्यं गृह्यते। (अन्तम्) सीमानम् (आपुः) प्राप्नुवन्ति। अत्र लडर्थे लिट्। (न) निषेधार्थे (मायाभिः) गर्जनांधकारविद्युदादिवत्कपटधूर्त्तताधर्मादिभिः (धनदाम्) वृष्टिवद्राजनीतिम् (पर्य्यभूवन्) परितस्सर्वतस्तिरस्कुर्वन्ति (युजम्) यो युज्यते तम्। अत्र क्विप् प्र०। (वज्रम्) छेदकत्वादिगुणयुक्तं किरणविद्युदाख्यादिवशस्त्रादिकम्। वज्र इति वज्रनामसु पठितम्। निघं० २।२०। (वृषभः) जलवद्वर्षयति शस्त्रसमूहम् (चक्रे) करोति। अत्र लडर्थे लिट्। (इन्द्रः) सूर्यलोकसदृक् शूरवीरसभाध्यक्षो राजा (निः) नितराम् (ज्योतिषा) प्रकाशवद्विद्यान्यायादिसद्गुणप्रकाशेन (तमसः) अन्धकारवदविद्याछलाधर्मव्यवहारस्य (गाः) पृथिवी इव मन आदीन्द्रियाणि (अधुक्षत्) प्रपिपूर्द्धि। अत्र लोडर्थे लुङ् ॥१०# [अन्वये, आर्य भाषायाः पदार्थे च ’दस्य्वादयः शत्रवः’ अस्यार्थः स्खलितः। सं०]

हे सभा के स्वामी आप ! जैसे इस मेघ के (ये) जो बद्दलादि अवयव (दिवः) सूर्य के प्रकाश और (पृथिव्याः) अन्तरिक्ष की (अन्तम्) मर्यादा को (नापुः) नहीं प्राप्त होते (मायाभिः) अपनी गर्जना अंधकार और बिजली आदि माया मे (धनदाम्) पृथिवी का (न) (पर्यभूवन्) अच्छे प्रकार आच्छादन नहीं कर सकते हैं उन पर (वृषभः) वृष्टिकर्त्ता (इन्द्रः) छेदन करनेहारा सूर्य (युजं) प्रहार करने योग्य (वज्रम्) किरण समूह को फेंक के (ज्योतिषा) अपने तेज प्रकाश से (तमसः) अंधेर को (निश्चक्रे) निकाल देता और (गाः) पृथिवी लोकों को वर्षा से (अधुक्षत्) पूर्ण कर देता है वैसे जो शत्रुजन न्याय के प्रकाश और भूमि के राज्य के अन्त को न पावें धन देनेवाली राजनीति का नाश न कर सकें उन वैरियों पर अपनी प्रभुता विद्यादान से अविद्या की निवृत्ति और प्रजा को सुखों से पूर्ण किया कीजिये ॥१०

 

अन्वयः-

हे सभेश त्वं यथास्य वृत्रस्य ये घनादयोऽवयवा दिवः सूर्य्यप्रकाशस्य पृथिव्या अन्तरिक्षस्य चान्तं नापुर्मायाभिर्धनदां न पर्यभूवन् तानुपरि वृषभ इन्द्रो युजं वज्रं प्रक्षिप्य ज्योतिषा तमस आवरणं निश्चक्रे गा अधुक्षत्तथा शत्रुषु वर्त्तस्व १०

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। मनुष्यैः सूर्यस्य स्वभावप्रकाशसदृशानि कर्माणि कृत्वा सर्वशत्र्वन्यायाऽन्धकारं विनाश्य धर्मेण राज्यं सेवनीयम्। न हि मायाविनां कदाचित् स्थिरं राज्यं जायते तस्मात्स्वयममायाविभिर्विद्वद्भिः शत्रुप्रयुक्तां मायां निवार्य्य राज्यकरणायोद्यतैर्भवितव्यमिति १०

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। मनुष्यों को योग्य है कि सूर्य के तेजरूप स्वभाव और प्रकाश के सदृश कर्म कर और सब शत्रुओं के अन्यायरूप अंधकार का नाश करके धर्म से राज्य का सेवन करें। क्योंकि छली कपटी लोगों का राज्य स्थिर कभी नहीं होता इससे सबको छलादि दोष रहित विद्वान् होके शत्रुओं की माया में न फँस के राज्य का पालन करने के लिये अवश्य उद्योग करना चाहिये ॥१०

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