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Mantra Rig 01.033.005

MANTRA NUMBER:

Mantra 5 of Sukta 33 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 1 of Adhyaya 3 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 38 of Anuvaak 7 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- विराट्त्रिस्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

परा॑ चिच्छी॒र्षा व॑वृजु॒स्त इ॒न्द्राय॑ज्वानो॒ यज्व॑भि॒: स्पर्ध॑मानाः प्र यद्दि॒वो ह॑रिवः स्थातरुग्र॒ निर॑व्र॒ताँ अ॑धमो॒ रोद॑स्योः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

परा चिच्छीर्षा ववृजुस्त इन्द्रायज्वानो यज्वभिः स्पर्धमानाः प्र यद्दिवो हरिवः स्थातरुग्र निरव्रताँ अधमो रोदस्योः

 

The Mantra's transliteration in English

parā cic chīrā vavjus ta indrāyajvāno yajvabhi spardhamānā | pra yad divo hariva sthātar ugra nir avratām̐ adhamo rodasyo 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

परा॑ चि॒त् शी॒र्षा व॒वृ॒जुः॒ ते॒ इ॒न्द्र॒ अय॑ज्वानः यज्व॑ऽभिः स्पर्ध॑मानाः प्र यत् दि॒वः ह॒रि॒ऽवः॒ स्था॒तः॒ उ॒ग्र॒ निः अ॒व्र॒तान् अ॒ध॒मः॒ रोद॑स्योः

 

The Pada Paath - transliteration

parā | cit | śīrā | vavju | te | indra | ayajvāna | yajva-bhi | spardhamānā | pra | yat | diva | hari-va | sthāta | ugra | ni | avratān | adhama | rodasyoḥ 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३३।०

मन्त्रविषयः-

अथेन्द्रशब्देन शूरवीरकृत्यमुपदिश्यते।

अब अगले मन्त्र में इन्द्रशब्द से शूरवीर के काम का उपदेश किया है।

 

पदार्थः-

(परा) दूरीकरणे (चित्) उपमायाम् (शीर्षा) शिरांसि। अत्र अचिशीर्षः। अ० ।१।२। इति शीर्षादेशः। शेश्छन्दसि व० इति शेर्लोपः। (ववृजुः) त्यक्तवन्तः। (ते) वक्ष्यमाणाः (इन्द्र) शत्रुविदारयितः शूरवीर (अयज्वानः) यज्ञानुष्ठानं त्यक्तवन्तः (यज्वभिः) कृतयज्ञानुष्ठानैः सह (स्पर्धमानाः) ईर्ष्यकाः (प्र) प्रकृष्टार्थे (यत्) यस्मात् (दिवः) प्रकाशस्य (हरिवः) हरयोश्वहस्त्यादयः प्रशस्ताः सेनासाधका विद्यन्ते यस्य स हरिवाँस्तत्संबुद्धौ (स्थातः) यो युद्धे तिष्ठतीति तत्संबुद्धौ (उग्र) दुष्टान् प्रति तीक्ष्णव्रत। (निः) नितराम् (अव्रतान्) व्रतेन सत्याचरणेन हीनान् मिथ्यावादिनो दुष्टान्। (अधमः) शब्दैः शिक्षय (रोदस्योः) द्यावापृथिव्योः। रोदस्ये रिति द्यावापृथिव्योर्नामसु पठितम्। निघं० ३।३०। ॥

हे (हरिवः) प्रशंसित सेना आदि के साधन घोड़े हाथियों से युक्त (प्रस्थातः) युद्ध में स्थित होने और (उग्र) दुष्टों के प्रति तीक्ष्णव्रत धारण करनेवाले (इन्द्र) सेनापति ! (चित्) जैसे हरण आकर्षण गुण युक्त किरणवान् युद्ध में स्थित होने और दुष्टों को अत्यन्त ताप देनेवाला सूर्यलोक (रोदस्योः) अन्तरिक्ष और पृथिवी का प्रकाश और आकर्षण करता हुआ मेघ के अवयवों को छिन्न-भिन्न कर उसका निवारण करता है वैसे आप (यत्) जो (अयज्वानः) यज्ञ के न करनेवाले (यज्वभिः) यज्ञ के करनेवालों से (स्पर्द्धमानाः) ईर्षा करते हैं वे जैसे (शीर्षाः) अपने शिरों को (ते) तुम्हारे सकाश से (ववृजुः) छोड़ने वाले हों वैसे उन (अव्रतान्) सत्याचरण आदि व्रतों से रहित मनुष्यों को (निरधमः) अच्छे प्रकार दण्ड देकर शिक्षा कीजिये ॥

 

अन्वयः-

हे हरिवो युद्धं प्रति प्रस्थातरुग्रेन्द्र यथा प्रख्यातोग्रेन्द्रः सूर्यलोको रोदस्योः प्रकाशार्षणे कुर्वन् वृत्रावयवाँश्छित्वा पराधमति तथैव त्वं यद्येयज्वानो यज्वभिः स्पर्धमानाः सन्ति ते यथा शीर्षा शिरांसि ववृजुस्त्यक्तवन्तो भवेयुस्तानव्रताँस्त्वं निरधमो नितरां शिक्षय दण्डय ॥

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमालंकारः। यथासूर्यो दिनं पृथिव्यादिकं प्रकाशं च धृत्वा वृत्रान्धकारं निवार्य वृष्ट्या सर्वान् प्राणिनः सुखयति तथैव मनुष्यैः सद्गुणान् धृत्वासद्गुणाँस्त्यक्त्वाधार्मिकान् दण्डयित्वा विद्यासुशिक्षाधर्मोपदेशवर्षणेन सर्वान् प्राणिनः सुखयित्वा सत्यराज्यं प्रचारणीयमिति ॥

इस मंत्र में उपमालंकार है। जैसे सूर्य दिन और पृथिवी और प्रकाश को धारण तथा मेघ रूप अन्धकार को निवारण करके वृष्टि द्वारा सब प्राणियों को सुख युक्त करता है वैसे ही मनुष्यों को उत्तम-२ गुणों का धारण खोटे गुणों को छोड़ धार्मिकों की रक्षा और अधर्मी दुष्ट मनुष्यों को दंड देकर विद्या उत्तम शिक्षा और धर्मोपदेश की वर्षा से सब प्राणियों को सुख देके सत्य के राज्य का प्रचार करना चाहिये ॥

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