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Mantra Rig 01.033.002

MANTRA NUMBER:

Mantra 2 of Sukta 33 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 1 of Adhyaya 3 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 35 of Anuvaak 7 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

उपेद॒हं ध॑न॒दामप्र॑तीतं॒ जुष्टां॒ श्ये॒नो व॑स॒तिं प॑तामि इन्द्रं॑ नम॒स्यन्नु॑प॒मेभि॑र॒र्कैर्यः स्तो॒तृभ्यो॒ हव्यो॒ अस्ति॒ याम॑न्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

उपेदहं धनदामप्रतीतं जुष्टां श्येनो वसतिं पतामि इन्द्रं नमस्यन्नुपमेभिरर्कैर्यः स्तोतृभ्यो हव्यो अस्ति यामन्

 

The Mantra's transliteration in English

uped aha dhanadām apratīta juṣṭā na śyeno vasatim patāmi | indra namasyann upamebhir arkair ya stotbhyo havyo asti yāman 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

इत् अ॒हम् ध॒न॒ऽदाम् अप्र॑तिऽइतम् जुष्टा॑म् श्ये॒नः व॒स॒तिम् प॒ता॒मि॒ इन्द्र॑म् न॒म॒स्यन् उ॒प॒ऽमेभिः॑ अ॒र्कैः यः स्तो॒तृऽभ्यः॑ हव्यः॑ अस्ति॑ याम॑न्

 

The Pada Paath - transliteration

upa | it | aham | dhana-dām | aprati-itam | juṣṭām | na | śyena | vasatim | patāmi | indram | namasyan | upa-mebhi | arkai | ya | stot-bhya | havya | asti | yāman 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३३।०२

मन्त्रविषयः-

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते।

फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(उप) सामीप्ये (इत्) एव (अहम्) मनुष्यः (धनदाम्) यो धनं ददाति तम् (अप्रतीतम्) यश्चक्षुरादीन्द्रियैर्न प्रतीयते तमगोचरम्। (जुष्टाम्) पूर्वकालसेविताम् (न) इव (श्येनः) वेगवान् पक्षी (वसतिम्) निवासस्थानम् (पतामि) प्राप्नोमि (इन्द्रम्) अखंडैश्वर्यप्रदं जगदीश्वरम् (नमस्यन्) नमस्कुर्वन् अत्र नमोवरिवश्चित्रङः क्यच्। अ० ३।१।१। इति क्यच्। (उपमेभिः) उपमीयन्ते यैस्तै। अत्र माङ् धातोः घञर्थे क विधानम्। इति वार्त्तिकेन करणे कः प्रत्ययः। बहुलं छन्दसि इति भिस ऐस् न। (अर्कैः) अनेकैः सूर्यलोकैः (यः) पूर्वोक्तः सूर्यलोकोत्पादकः (स्तोतृभ्यः) य ईश्वरं स्तुवन्ति तेभ्यः (हव्यः) होतुमादातुमर्हः (अस्ति) वर्त्तते (यामन्) याति गच्छति प्राप्नोति स यामा तस्मिन्नस्मिन् संसारे। अत्र सुपां सुलुग् इति विभक्तेर्लुक् ॥२॥

(यः) जो (हव्यः) ग्रहण करने योग्य ईश्वर (स्तोतृभ्यः) अपनी स्तुति करनेवालों के लिये धन देने वाला (अस्ति) है उस (अप्रतीतम्) चक्षु आदि इन्द्रियों से अगोचर (धनदाम्) धन देने वाले (इन्द्रम्) परमेश्वर को (नमस्यन्) नमस्कार करता हुआ (अहम्) मैं (न) जैसे (जुष्टाम्) पूर्व काल में सेवन किये हुए (वसतिम्) *घुसला को (श्येनः) वाज पक्षी प्राप्त होता है वैसे (यामन्) गमनशील अर्थात् चलायमान इस संसार में (उपमेभिः) उपमा देने के योग्य (अर्कैः) अनेक सूर्यों से (इत्) ही (उपपतामि) प्राप्त होता हूं ॥२॥ *[घौंसले। सं०]

 

अन्वयः-

यो हव्यः स्तोतृभ्यो धनप्रदोस्ति तमप्रतीतं धनदामिन्द्रं नमस्यन्नहं जुष्टां वसतिं श्येनो नेव यामन् गमनशीलेस्मिन् संसार उपमेभिरर्कैरिदेवोपपताम्यभ्युपगच्छामि ॥२॥

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमालङ्कारः। यथा श्येनाख्यः पक्षी प्रावसेवितं सुखप्रदं निवासस्थानं स्थानान्तराद्वेगेन गत्वा प्राप्नोति तथैव परमेश्वरं नमस्यन्तो मनुष्या अस्मिन् संसारे तद्रचितैः सूर्यादिलोकदृष्टान्तैरीश्वरं निश्चित्य तमेवोपासताम् यावन्तोऽस्मिञ् जगति रचिताः पदार्था वर्त्तेते तावंतः सर्वे निर्मातारमीश्वरं निश्चापयंति। नहि निर्मात्रा विना किंचिन्निर्मितं संभवति। तथाऽस्मिन् मनुष्यै रचनीये व्यवहारे रचकेन विना किंचिदपि स्वतो न जायते तथैवेश्वरसृष्टौ वेदितव्यम्। अहो एवं सति य ईश्वरमनाहत्य नास्तिका भवंति तेषामिदं महदज्ञानं कुतः सभागतमिति। अत्राध्यापकविलसनेन श्येनस्य प्रसिद्धस्य पक्षिणो नामा विदित्वा गोदृष्टान्तो गृहीतोऽस्य मंत्रस्यान्यथार्थो वर्णितस्तस्मादिदमस्य व्याख्यानमनादरणीयमस्तीति ॥२॥

इस मंत्र में उपमालंकार है। जैसे श्येन अर्थात् वेगवान् पक्षी अपने पहिले सेवन किये हुए सुख देनेवाले स्थान को स्थानान्तर से चलकर प्राप्त होता है वैसे ही परमेश्वर को नमस्कार करते हुए मनुष्य उसीके बनाये इस संसार में सूर्य आदि लोकों के दृष्टान्तों से ईश्वर का निश्चय करके उसीकी प्राप्ति करें क्योंकि जितने इस संसार में रचे हुए पदार्थ हैं वे सब रचने वाले का निश्चय कराते हैं और रचनेवाले के विना किसी जड़ पदार्थ की रचना कभी नहीं हो सकती जैसे इस व्यवहार में रचनेवाले के विना कुछ भी पदार्थ नहीं बन सकता वैसे ही ईश्वर की सृष्टि में भी जानना चाहिये, बड़ा आश्चर्य है कि ऐसे निश्चय हो जाने पर भी जो ईश्वर का अनादर करके नास्तिक हो जाते हैं उनको यह बड़ा अज्ञान क्योंकर प्राप्त होता है ॥२॥

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