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Mantra Rig 01.032.015

MANTRA NUMBER:

Mantra 15 of Sukta 32 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 38 of Adhyaya 2 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 33 of Anuvaak 7 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

इन्द्रो॑ या॒तोऽव॑सितस्य॒ राजा॒ शम॑स्य शृ॒ङ्गिणो॒ वज्र॑बाहुः सेदु॒ राजा॑ क्षयति चर्षणी॒नाम॒रान्न ने॒मिः परि॒ ता ब॑भूव

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

इन्द्रो यातोऽवसितस्य राजा शमस्य शृङ्गिणो वज्रबाहुः सेदु राजा क्षयति चर्षणीनामरान्न नेमिः परि ता बभूव

 

The Mantra's transliteration in English

indro yāto 'vasitasya rājā śamasya ca śṛṅgio vajrabāhu | sed u rājā kayati caraīnām arān na nemi pari tā babhūva 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

इन्द्रः॑ या॒तः अव॑ऽसितस्य राजा॑ शम॑स्य च॒ शृ॒ङ्गिणः॑ वज्र॑ऽबाहुः सः इत् ऊँ॒ इति॑ राजा॑ क्ष॒य॒ति॒ च॒र्ष॒णी॒नाम् अ॒रान् ने॒मिः परि॑ ता ब॒भू॒व॒

 

The Pada Paath - transliteration

indra | yāta | ava-sitasya | rājā | śamasya | ca | śṛṅgia | vajra-bāhu | sa | it | o iti | rājā | kayati | caraīnām | arān | na | nemi | pari | tā | babhūva 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati     

०१।०३२।१

मन्त्रविषयः-

पुनः सूर्यः कीदृश इत्युपदिश्यते।

फिर उक्त सूर्य कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(इन्द्रः) सूर्यलोक इव सभासेनापती राज्यं प्राप्तः (यातः) गमनादिव्यवहारप्रापकः (अवसितस्य) निश्चितस्य चराचरस्य जगतः (राजा) यो राजते दीप्यते प्रकाशते सः (शमस्य) शाम्यन्ति येन तस्य शान्तियुक्तस्य मनुष्यस्य (च) समुच्चये (शृङ्गिणः) शृङ्गयुक्तस्य गवादेः पशुसमूहस्य (वज्रबाहुः) वज्रः शस्त्रसमूहो बाहौ यस्य सः (सः) (इत्) एव (उ) अप्यर्थे (राजा) न्यायप्रकाशकः सभाध्यक्षः (क्षयति) निवासयति गमयति वा (चर्षणीनाम्) मनुष्याणाम्। (अरान्) चक्रावयवान् (न) इव (नेमिः) रथाङ्गम् (परि) सर्वतोऽर्थे (ता) तानि यानि जगतो दुष्टानि कर्माणि पूर्वोक्ताँल्लोकान्वा। अत्र शेश्छन्दसि बहुलम् इति शेर्लोपः। (बभूव) भवेः। अत्र लिङर्थे लिट् ॥१५॥

सूर्य के समान (वज्रबाहुः) शस्त्रास्त्रयुक्तबाहु (इन्द्रः) दुष्टों का निवारण कर्ता (यातः) गमन आदि व्यवहार को वर्त्तानेवाला सभापति ! (अवसितस्य) निश्चित चराचर जगत् (शमस्य) शान्ति करनेवाले मनुष्य आदि प्राणियों (शृङ्गिणः) सींगों वाले गाय आदि पशुओं और (चर्षणीनाम्) मनुष्यों के बीच (अरान्) पहियों को धारनेवाले (नेमिः) धुरी के (न) मान (राजा) प्रकाशमान होकर (ता) उत्तम तथा नीच कर्मों के कर्त्ताओं सुख दुःखों को तथा (राजांसि) उक्त लोकों को (परिक्षयति) पहुंचाता और निवास करता है (उ) (इत्) वैसे ही (सः) वह सभी के (राजा) न्याय का प्रकाश करनेवाला (बभूव) होवे ॥१५॥

 

अन्वयः-

सूर्य्य इव वज्रबाहुरिन्द्रो यातः सभापतिरवसितस्य शमस्य शङ्गिणश्चर्षणीनां च मध्येऽरान्नेमिर्नेव ता तानि रजांसि परिक्षयति स चेदु-उतापि सर्वेषां राजा बभूव भवतु ॥१५॥

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमालङ्कारः। अत्र पूर्वमन्त्रात् रजांसीति पदमनुवर्त्तते। राजा यथा रथचक्रमरान् धृत्वा चालयति यथायं सूर्य्यश्चराचरस्य शान्ताशान्तस्य जगतो मध्ये प्रकाशमानः सन् सर्वाँल्लोकान् धरन् स्वस्वकक्षासु चालयति न चैतस्माद्विना कस्यचित्संनिहितस्य मूर्त्तिमतो लोकस्य धारणाकर्षणप्रकाशमेघ-वर्षणादीनि कर्माणि संभवितुमर्हन्ति तथा धर्मेण राज्यं पालयेत् ॥१५॥

अत्रेन्द्रवृत्रयुद्धालङ्कारवर्णनेनास्य पूर्वसूक्तोक्ताग्निशब्दार्थेन सह संगतिरस्तीति वेदितव्यम्

इति प्रथमस्य द्वितीयेऽष्टात्रिंशो वर्गः ३८ प्रथम मण्डले सप्तमेऽनुवाके द्वात्रिंशं च सूक्तमध्यायश्च द्वितीयः समाप्तः ॥२॥

श्रीमत्परिव्राजकाचार्य श्रीविरजानन्दसरस्वतीस्वामिनांशिष्येण दयानन्दसरस्वती-स्वामिनाविरचिते संस्कृत भाषार्थ भाषाभ्यां विभूषिते सुप्रमाणयुक्त ऋग्वेदभाष्ये द्वितीयोऽध्यायः पूर्त्तिमगमत् ॥२॥

इस मंत्र में उपमालङ्कार और पूर्व मंत्र से (रजांसि) इस पद की अनुवृत्ति आती है। राजा को चाहिये कि जैसे रथ का पहिया धुरियों को चलाता और जैसे यह सूर्य चराचर शांत और अशांत संसार में प्रकाशमान होकर सब लोकों को धारण किये हुए उन सभों को अपनी-२ कक्षा में चलाता है जैसे सूर्य के विना अति निकट मूर्त्तिमान् लोक की धारणा आकर्षण प्रकाश और मेघ की वर्षा आदि काम किसी से नहीं हो सकते हैं। वैसे धर्म से प्रजा को पालन किया करें ॥१५॥ 

इस सूक्त में सूर्य और मेघ के युद्ध वर्णन करने से इस सूक्त की पिछले सूक्त में प्रकाशित किये अग्नि शब्द के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये। यह पहिले अष्टक के दूसरे अध्याय में अड़तीसवां वर्ग और पहिले मण्डल के सातवें अनुवाक में बत्तीसवां सूक्त और दूसरा अध्याय भी समाप्त हुआ ॥३२॥ 

इति श्रीमत्परिव्राजकाचार्य श्रीविरजानन्दसरस्वतीस्वामिनां शिष्येण दयानन्दसरस्वतीस्वामिनो विरचिते संस्कृतभाषार्य्याभाषाभ्यां विभूषिते सुप्रमाणयुक्ते वेद भाष्ये द्वितीयोऽध्यायः पूर्त्तिमगमत् ॥२॥

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