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Mantra Rig 01.032.013

MANTRA NUMBER:

Mantra 13 of Sukta 32 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 38 of Adhyaya 2 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 31 of Anuvaak 7 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

नास्मै॑ वि॒द्युन्न त॑न्य॒तुः सि॑षेध॒ यां मिह॒मकि॑रद्ध्रा॒दुनिं॑ इन्द्र॑श्च॒ यद्यु॑यु॒धाते॒ अहि॑श्चो॒ताप॒रीभ्यो॑ म॒घवा॒ वि जि॑ग्ये

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

नास्मै विद्युन्न तन्यतुः सिषेध यां मिहमकिरद्ध्रादुनिं इन्द्रश्च यद्युयुधाते अहिश्चोतापरीभ्यो मघवा वि जिग्ये

 

The Mantra's transliteration in English

nāsmai vidyun na tanyatu siedha na yām miham akirad dhrāduni ca | indraś ca yad yuyudhāte ahiś cotāparībhyo maghavā vi jigye 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अ॒स्मै॒ वि॒द्युत् त॒न्य॒तुः सि॒से॒ध॒ याम् मिह॑म् अकि॑रत् ह्रा॒दुनि॑म् च॒ इन्द्रः॑ च॒ यत् यु॒यु॒धाते॒ इति॑ अहिः॑ च॒ उ॒त अ॒प॒रीभ्यः॑ म॒घऽवा॑ वि जि॒ग्ये॒

 

The Pada Paath - transliteration

na | asmai | vidyut | na | tanyatu | sisedha | na | yām | miham | akirat | hrādunim | ca | indra | ca | yat | yuyudhāteiti | ahi | ca | uta | aparībhya | magha-vā | vi | jigye 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३२।१३

मन्त्रविषयः-

एतयोरस्मिन् युद्धे कस्य विजयो भवतीत्युपदिश्यते।

इन दोनों के इस युद्ध में किस का विजय होता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(न) निषेधार्थे (अस्मै) इन्द्राय सूर्यलोकाय (विद्युत्) प्रयुक्ता स्तनयित्नुः (न) निषेधे (तन्यतुः) गर्जनसहिता (सिषेध) निवारयति। अत्र सर्वत्र लडर्थे लङलिटौ। (न) निवारणे (याम्) वक्ष्यमाणाम् (मिहम्) मेहति सिंचति यया वृष्ट्या ताम्। (अकिरत्) किरति विक्षिपति।  (ह्रादुनिम्) ह्रादतेव्यक्ताञ् शब्दान् करोति यया वृष्ट्याताम्। अत्र ह्रादधातोर्बाहुलकादौणादिक उनिः प्रत्ययः। (च) समुच्चये (इन्द्रः) सूर्यः (च) पुनरर्थे (यत्) यः। अत्रापि सुपांसु० इति सोर्लुक्। (युयुधाते) युध्येते (अहिः) मेघः (च) अन्योन्यार्थे (उत्) अपि (अपरीभ्यः) अपूर्णाभ्यः सेनाक्रियाभ्यः। अत्र पॄधातोः। अत्र इः। उ० ।१४४। #अनेन इः प्रत्ययः। कृदिकारादक्तिनः। अ० ।१।। अनेन* ङीष् प्रत्ययः। इदं पदं सायणाचार्येणाप्रमाणादपराभ्य इत्यशुद्धं व्याख्यातम्। (मघवा) मघं पूज्यं बहुविधं प्रकाशो धनं विद्यते यस्मिन् सः। अत्र भूम्न्यर्थे मतुप्। (वि) विशेषार्थे (जिग्ये) जयति ॥१३॥ # [‘१३९’ वै० यं० मुद्रित द्वितीयावृत्तावेषा संख्या वर्तते। सं०] *[ सूत्रस्थनियमेन। सं०]

हे सेनापते ! आप जैसे मेघ ने (अस्मै) इस सूर्य लोक के लिये छोड़ी हुई (विद्युत्) बिजुली (न) (सिषेध) इसकी कुछ रुकावट नहीं कर सकती (तन्यतुः) उस मेघ की गर्जना भी उस सूर्य को (न) (सिषेध) नहीं रोक सकती और वह (अहिः) मेघ (याम्) जिस (ह्रादुनिम्) गर्जना आदि गुणवाली (मिहम्) वरसा को (च) भी (अकिरत्) छोड़ता है वह भी सूर्य की (न) (सिषेध) हानि नहीं कर सकती है यह (इन्द्रः) सूर्यलोक अपनी किरणरूपी पूर्णसेना से युक्त (उत) और अपनी (अपरीभ्यः) अधूरी सेना से युक्त (अहिः) मेघ (च) भी ये दोनों (युयुधाते) परस्पर युद्ध किया करते हैं (यत्) अधिकबलयुक्त होने के कारण (मघवा) अत्यन्त प्रकाशवान् सूर्यलोक उस मेघ को (च) भी (विजिग्ये) अच्छे प्रकार जीत लेता है वैसे ही धर्मयुक्त पूर्णबल करके शत्रुओं का विजय कीजिये ॥१३॥

 

अन्वयः-

हे सेनापते त्वं यथा येनाहिनास्मा इन्द्राय प्रत्युक्ता विद्युदेनं न सिषेध निवारयितुं न शक्नोति। तण्यतुर्गर्जनाप्यस्मै प्रयुक्ता न सिषेध निषेद्धं समर्था न भवति योऽद्विर्या ह्रादुनिं मिहं वृष्टिं चाकिरत् प्रक्षिपति साऽप्यस्मै न सिषेध। अयमिन्द्रः परीभ्यः पूर्णाभ्यः सेनाभ्यो युक्त उताप्यपरीभ्यः सेनाभ्यो युक्तोऽहिर्मेघश्च परस्परं युयुधाते। यद्यस्मादधिकबलयुक्तत्वान् मघवा तं मेघं विजिग्ये विजयते तथैव पूर्णं बलं संपाद्य शत्रून् विजयस्व ॥१३॥

 

 

भावार्थः-

अत्र वाचकलुप्तोपमालंकारः। राजपुरुषैर्यथा वृत्रस्य यावन्ति विद्युदादीनि युद्धसाधनानि सन्ति तावन्ति सूर्यापेक्षया क्षुद्राणि वर्त्तेंते सूर्यस्य खलु युद्धसाधनानि तदपेक्षया महान्ति सन्ति। अत एव सर्वदा सूर्यस्यविजयो वृत्रस्य पराजयश्च भवति तथैव धर्म्मेण शत्रुविजयः कार्य्यः ॥१३॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। राजपुरुषों को योग्य है कि जैसे वृत्र अर्थात् मेघ के जितने बिजली आदि युद्ध के साधन हैं वे सब सूर्य के आगे क्षुद्र अर्थात् सब प्रकार निर्बल और थोड़े हैं और सूर्य के युद्धसाधन उसकी अपेक्षा से बड़े-२ हैं इसीसे सब समय में सूर्य ही का विजय और मेघ का पराजय होता रहता है वैसे ही धर्म से शत्रुओं को जीतें ॥१३॥

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