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Mantra Rig 01.032.010

MANTRA NUMBER:

Mantra 10 of Sukta 32 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 37 of Adhyaya 2 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 28 of Anuvaak 7 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अति॑ष्ठन्तीनामनिवेश॒नानां॒ काष्ठा॑नां॒ मध्ये॒ निहि॑तं॒ शरी॑रम् वृ॒त्रस्य॑ नि॒ण्यं वि च॑र॒न्त्यापो॑ दी॒र्घं तम॒ आश॑य॒दिन्द्र॑शत्रुः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अतिष्ठन्तीनामनिवेशनानां काष्ठानां मध्ये निहितं शरीरम् वृत्रस्य निण्यं वि चरन्त्यापो दीर्घं तम आशयदिन्द्रशत्रुः

 

The Mantra's transliteration in English

atiṣṭhantīnām aniveśanānāṣṭhānām madhye nihita śarīram | vtrasya niya vi caranty āpo dīrgha tama āśayad indraśatru 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अति॑ष्ठन्तीनाम् अ॒नि॒ऽवे॒श॒नाना॑म् काष्ठा॑नाम् मध्ये॑ निऽहि॑तम् शरी॑रम् वृ॒त्रस्य॑ नि॒ण्यम् वि च॒र॒न्ति॒ आपः॑ दी॒र्घम् तमः॑ अ॒श॒य॒त् इन्द्र॑ऽशत्रुः

 

The Pada Paath - transliteration

atiṣṭhantīnām | ani-veśanānān | kāṣṭhānām | madhye | ni-hitam | śarīram | vtrasya | niyam | vi | caranti | āpa | dīrgham | tama | ā | aśayat | indra-śatruḥ 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३२।१०

मन्त्रविषयः-

पुनस्तस्य शरीरं कीदृशं क्व तिष्ठतीत्युपदिश्यते।

फिर उस मेघ का शरीर कैसा और कहां स्थित होता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(अतिष्ठन्तीनाम्) चलन्तीनामपाम् (अनिवेशनानाम्) अविद्यमानं निवेशनमेकत्रस्थानं यासां तासाम् (काष्ठानाम्) काश्यन्ते प्रकाश्यन्ते यासु ता दिशः। काष्ठा इति दिङ्नामसु पठितम्। निघं० १।। अत्र हनिकुषिना० उ० २।२। इति क्थन् प्रत्ययः। (मध्ये) अन्तः (निहितम्) स्थापितम् (शरीरम्)। शीर्यते हिंस्यते यत्तत (वृत्रस्य) मेघस्य (निण्यम्) निश्चितान्तार्हितम्। निण्यमिति निर्णीतांतर्हितनामसु पठितम्। निघं० ३।२। (वि) (चरन्ति) विविधतया गच्छंत्यागच्छन्ति (अपः) जलानि (दीर्घम्) महान्तम् (तमः) अन्धकारम् (आ) समन्तात् (अशयत्) शेते। बहुलं छन्दसि इति शपोलुङ् न। (इन्द्रशत्रुः) इन्द्रः शत्रुर्यस्य स मेघः यास्कमुनिरेवमिमं मंत्रं व्याचष्टे। अतिष्ठतीनामनिविशमानानामित्यस्यावराणां काष्ठानां मध्ये निहितं शरीरं मेघः। शरीरं शृणातेः शम्नातेर्वा। वृत्रस्य निण्यं निर्णामं विचरन्ति विजानंत्याप इति दीर्घ द्राघतेस्तमस्तनीते राशयदा शेतेरिन्द्रशत्रु रिंद्रोस्यशमयिता वा शातयिता वा तस्मादिन्द्रशत्रुस्तत्का वृत्रोमेघ इति नैरुक्ताः। निरु० २।१। ॥१०॥

हे सभा स्वामिन् ! तुम को चाहिये कि जिस (वृत्रस्य) मेघ के (अनिवेशनानाम्) जिनको स्थिरता नहीं होती (अतिष्ठन्तीनाम्) जो सदा बहनेवाले हैं उन जलों के बीच (निण्यम्) निश्चय करके स्थिर (शरीरम्) जिसका छेदन होता है ऐसा शरीर है वह (काष्ठानाम्) सब दिशाओं के बीच (निहितम्) स्थित होता है। तथा जिसके शरीर रूप (अपः) जल (दीर्घम्) बड़े (तमः) अन्धकार रूप घटाओं में (विचरन्ति) इधर-उधर जाते आते है वह (इन्द्रशत्रुः) मेघ उन जलों में इकट्ठा वा अलग-२ छोटा-२ बदल रूप होके (अशयत्) सोता है। वैसे ही प्रजा के द्रोही शत्रुओं को उनके सहायियों के सहित बांध के सब दिशाओं सुलाना चाहिये ॥१०॥

 

अन्वयः-

भोः सभेश त्वया यथा यस्य मेघस्य निवेशनानामतिष्ठन्तीनामपां निण्यं शरीरं काष्टानां दिशां मध्ये निहितमस्ति यस्य च शरीराख्या आपो दीर्घं तमो विचरन्ति स इन्द्रशत्रुर्मेघस्तासामपां मध्ये समुदायावयविरूपेणाशयत्समन्ताच्छेते तथा प्रजायाः द्रोग्धारः ससहायाश्शत्रवो बध्वा काष्ठानां मध्ये शाययितव्याः ॥१०॥

 

 

भावार्थः-

अत्रवाचकलुप्तोपमालङ्कारः। सभापतेर्योग्यमस्ति यथायं मेघोऽन्तरिक्षस्थास्वप्सु सूक्ष्मत्वान्न दृश्यते पुनर्यदा घनाकारो वृष्टिद्वारा जलसमुदायरूपो भवति तदा दृष्टिपथमागच्छति। परन्तु या इमा आप एकं क्षणमपि स्थितिं न लभन्ते किन्तु सर्वदैवोपर्यधोगच्छन्त्यागच्छन्ति च याश्च वृत्रस्य शरीरं वर्तन्ते ता अन्तरिक्षेस्थिता अतिसूक्ष्मा नैव दृश्यन्ते। तथा महाबलान् शत्रून् सूक्ष्मबलान् कृत्वा वशं नयेत् ॥१०॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सभापति को योग्य है कि जैसे यह मेघ अन्तरिक्ष में ठहरानेवाले जलों में सूक्ष्मपन में नहीं दीखता फिर जब घन के आकार वर्षा के द्वारा जल का समुदाय रूप होता है तब वह देखने में आता है और जैसे वे जल एक क्षणभर भी स्थिति को नहीं पाते हैं किन्तु सब काल में ऊपर जाना वा नीचे आना इस प्रकार घूमते ही रहते हैं और जो मेघ के शरीर रूप हैं वे अन्तरिक्ष में रहते हुए अति सूक्ष्म होने से नहीं दीख पड़ते वैसे बड़े-२ बल वाले शत्रुओं को भी अल्प बल वाले करके वशीभूत किया करे ॥१०॥

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