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Mantra Rig 01.032.008

MANTRA NUMBER:

Mantra 8 of Sukta 32 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 37 of Adhyaya 2 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 26 of Anuvaak 7 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

न॒दं भि॒न्नम॑मु॒या शया॑नं॒ मनो॒ रुहा॑णा॒ अति॑ य॒न्त्याप॑: याश्चि॑द्वृ॒त्रो म॑हि॒ना प॒र्यति॑ष्ठ॒त्तासा॒महि॑: पत्सुत॒:शीर्ब॑भूव

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

नदं भिन्नममुया शयानं मनो रुहाणा अति यन्त्यापः याश्चिद्वृत्रो महिना पर्यतिष्ठत्तासामहिः पत्सुतःशीर्बभूव

 

The Mantra's transliteration in English

nada na bhinnam amuyā śayānam mano ruhāā ati yanty āpa | yāś cid vtro mahinā paryatiṣṭhat tāsām ahi patsutaśīr babhūva 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

न॒दम् भि॒न्नम् अ॒मु॒या शया॑नम् मनः॑ रुहा॑णाः अति॑ य॒न्ति॒ आपः॑ याः चि॒त् वृ॒त्रः म॒हि॒ना प॒रि॒ऽअति॑ष्ठत् तासा॑म् अहिः॑ प॒त्सु॒तः॒शीः ब॒भू॒व॒

 

The Pada Paath - transliteration

nadam | na | bhinnam | amuyā | śayānam | mana | ruhāā | ati | yanti | āpa | yā | cit | vtra | mahinā | pari-atiṣṭhat | tāsām | ahi | patsutaśī | babhūva 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३२।०

मन्त्रविषयः-

पुनस्तौ परस्परं किं कुरुत इत्युपदिश्यते।

फिर वे दोनों परस्पर क्या करते हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(नदम्) महाप्रवाहयुक्तम् (न) इव (भिन्नम्) विदीर्णतटम् (अमुया) पृथिव्या सह (शयानम्) कृतशयनम् (मनः) अन्तःकरणमिव (रुहाणाः) प्रादुर्भवन्त्यबलन्त्योनद्यः (अति) अतिशयार्थे (यन्ति) गच्छन्ति (आपः) जलानि। आप इत्युदकनामसु पठितम्। निघं० १।१२। (याः) मेघमण्डलस्थाः (चित्) एव (वृत्रः) मेघः (महिना) महिम्ना। अत्र छान्दसोवर्णलोपोवा इतिमकारलोपः। (पर्यतिष्ठत्) सर्वत आवृत्यस्थितः (तासाम्) अपां समूहः (अहिः) मेघः (पत्सुतःशीः) यः पादेष्वधःशेते सः। अत्र सप्तम्यन्तात्पादशब्दात्। इतराभ्योपि दृश्यन्ते। अ० ।३।१४। इति तसिल्। वाछन्दसिसर्वेविधयोभवन्ति इति विभक्त्यलुक्। शौङ्धातोःक्विप् च। (बभूव) भवति। अत्र लडर्थे लिट्

भो राजाधिराज आप जैसे यह (वृत्रः) मेघ (महिना) अपनी महिमा से (पर्यतिष्ठत्) सब ओर से एकता को प्राप्त और (अहिः) सूर्य के ताप से मारा हुआ (तासाम्) उन जलों के बीच में स्थित (पत्सुतःशीः) पादों के तले सोनेवाला सा (बभूव) होता है उस मेघ का शरीर (मनः) मननशील अन्तःकरण के सदृश (रुहाणाः) उत्पन्न होकर चलनेवाली नदी जो अन्तरिक्ष में रहनेवाले (चित्) ही (याः) जल (भिन्नम्) विदीर्ण तटवाले (शयानं) सोते हुए के (न) तुल्य (नदम्) महाप्रवाहयुक्त नद को (यन्ति) जाते और वे जल (न) (अमुया) इस पृथिवी के साथ प्राप्त होते हैं वैसे सब शत्रुओं को बांध के वश में कीजिये ॥

 

अन्वयः-

भो महाराज त्वं यथायं वृत्रो मेघो महिना स्वमहिम्ना पर्यतिष्ठन्निरोधको भूत्वा सर्वतः स्थितोहिर्हतः सन् तासामपां मध्ये स्थितः पत्सुतःशीर्बभूव भवति तस्य शरीरं मनोरुहाणा याश्चिदेवान्तरिक्षस्था आपो भिन्नशयानं यन्ति गच्छन्ति नदं नेवामुया भूम्या सह वर्त्तन्ते तथैव सर्वान् शत्रून् बद्ध्वा वशं नय ॥

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमावाचकलुप्तोपमालङ्कारौ। यावज्जलं सूर्येण छेदितं वायुना सह मेघमण्डलं गच्छति तावत्सर्वं मेघ एव जायते यदा जलाशयोतीव वर्द्धते तदा सघनपृतनः सन् स्वविस्तारेण सूर्यज्योतिर्निरुणद्धि तं यदा सूर्यः स्वकिरणैश्छिनत्ति तदायमितस्ततो जलानि महानंद तडागं समुद्रं वा प्राप्य शेरते सोपि पृथिव्यां यत्र तत्र शयानः सन् मनुष्यादीनां पादाध इव भवत्येवमधार्मिकोप्येधित्वा सद्यो नश्यति ॥

इस मंत्र में वाचकलुप्तोपमा और उपमालंकार हैं। जितना जल सूर्य से छिन्न-भिन्न होकर पवन के साथ मेघमण्डल को जाता है वह सब जल मेघरूप ही हो जाता है जब मेघ के जल का समूह अत्यन्त बढ़ता है तब मेघ घनी-२ घटाओं से घुमड़ि-२ के सूर्य के प्रकाश को ढांप लेता है उसको सूर्य अपनी किरणों से जब छिन्न-भिन्न करता है तब इधर-उधर आए हुए जल बड़े-२ नद ताल और समुद्र आदि स्थानों को प्राप्त होकर सोते हैं वह मेघ भी पृथिवी को प्राप्त होकर जहां तहां सोता है अर्थात् मनुष्य आदि प्राणियों के पैरों में सोता सा मालूम होता है वैसे अधार्मिक मनुष्य भी प्रथम बढ़ के शीघ्र नष्ट हो जाता है ॥

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