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Mantra Rig 01.032.006

MANTRA NUMBER:

Mantra 6 of Sukta 32 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 37 of Adhyaya 2 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 24 of Anuvaak 7 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अ॒यो॒द्धेव॑ दु॒र्मद॒ हि जु॒ह्वे म॑हावी॒रं तु॑विबा॒धमृ॑जी॒षम् नाता॑रीदस्य॒ समृ॑तिं व॒धानां॒ सं रु॒जाना॑: पिपिष॒ इन्द्र॑शत्रुः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अयोद्धेव दुर्मद हि जुह्वे महावीरं तुविबाधमृजीषम् नातारीदस्य समृतिं वधानां सं रुजानाः पिपिष इन्द्रशत्रुः

 

The Mantra's transliteration in English

ayoddheva durmada ā hi juhve mahāvīra tuvibādham am | nātārīd asya samti vadhānā sa rujānā pipia indraśatru 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अ॒यो॒द्धाऽइ॑व॑ दुः॒ऽमदः॑ हि जु॒ह्वे म॒हा॒ऽवी॒रम् तु॒वि॒ऽबा॒धम् ऋ॒जी॒षम् अ॒ता॒री॒त् अ॒स्य॒ सम्ऽऋ॑तिम् व॒धाना॑म् सम् रु॒जानाः॑ पि॒पि॒षे॒ इन्द्र॑ऽशत्रुः

 

The Pada Paath - transliteration

ayoddhāiva | du-mada | ā | hi | juhve | mahāvīram | tuvi-bādham | am | na | tārīt | asya | sam-tim | vadhānām | sam | rujānā | pipie | indra-śatruḥ 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३२।०

मन्त्रविषयः-

पुनस्तौ कथं युध्येते इत्युपदिश्यते।

फिर वे कैसे युद्ध करते हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(अयोद्धेव) न योद्धा अयोद्धा त्द्वत् (दुर्मदः) दुष्टो मदो यस्य सः (आ) समन्तात् (हि) खलु (जुह्वे) आह्वत वानस्मि वा छन्दसि सर्वेविधयो भवन्ती इत्युवङादेशो न। (महावीरम्) महांश्चासौ वीरश्च तमिव महाकर्षणप्रकाशादिगुणयुक्तं सूर्य्यलोकम् (तुविबाधम्) यो बहून् शत्रून् बाधते तम् (ऋजीषम्) उपार्जकम्। अत्र। अर्जेर्ऋज्च। उ० ।२। इत्यर्जधातोरीषन् प्रत्यय ऋजादेशश्च। (न) निषेधार्थे (अतारीत्) तरत्युल्लंङ्घयति वा। अत्र वर्त्तमाने लुङ्। (अस्य) सूर्यलोकस्य। (समृतिम्) संगतिम्। (बधानाम्) हननानाम् (सम्) सम्यगर्थे (रुजानाः) नद्यः। रुजाना इति नदीनामसु पठितम्। निघं० १।१३। (पिपिषे) पिष्टः। अत्र व्यत्ययेनात्मनेपदं च। (इन्द्रशत्रुः) इन्द्रः शचुर्यस्य वृत्रस्य सः ॥

(दुर्मदः) दुष्ट अभिमानी (अयोद्धेव) युद्ध की इच्छा न करनेवाले पुरुष के समान मेघ (ऋजीषम्) पदार्थों के रस को इकट्ठे करने और (तुविबाधम्) बहुत शत्रुओं को मारनेहारे के तुल्य (महावीरम्) अत्यन्त बल युक्त शूरवीर के समान सूर्य्यलोक को (आजुह्वे) ईर्ष्या से पुकारते हुए के सदृश वर्त्तता है जब उसको रोते हुए के सदृश सूर्य ने मारा तब वह मारा हुआ (इन्द्रशत्रुः) सूर्य्य का शत्रु मेघ (पिपिषे) सूर्य से पिसजाता है और वह (अस्य) इस सूर्य की (बधानाम्) ताड़नाओं के (समृतिम्) समूह को (नातारीत्) सह नहीं सकता और (हि) निश्चय है कि इस मेघ के शरीर से उत्पन्न हुई (रुजानाः) नदियां पर्वत और पृथिवी के बड़े २ टीलों को छिन्न-भिन्न करती हुई बहती हैं वैसे ही सेनाओं में प्रकाशमान सेनाध्यक्ष शत्रुओं में चेष्टा किया करे ॥

 

अन्वयः-

यथा दुर्मदोयोद्धेवायं मेघ ऋजीषन्तु विबाधं महावीरमिन्द्रं सूर्यलोकमाजुह्वे यदा सर्वतो रुतवानिव हतोयमिन्द्रशत्रुः संपिपिषे स मेघोऽस्ये बधानां समृतिं नातःरीत्समंतान्नोल्लंघितवान् हि खल्वस्य वृत्रस्य शरीरादुत्पन्नारुजानाः नद्यः पर्वतपृथिव्यादि कूलान् छिन्दन्त्यश्चलन्ति तथा सेनासुविराजमानोऽध्यक्षः शत्रुषु चेष्टेत

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमालङ्कारः। यथा मेघोजगत्प्रकाशाय प्रवर्त्तमानस्य सूर्य्यस्य प्रकाशमकस्मादुत्थायावृत्य च तेन सह युद्ध्यत इव प्रवर्त्तते ऽपितुसूर्य्यस्य सामर्थ्य नालं भवति। यदायं सूर्येण हतो भूमौ निपतति तदातच्छरीरावयवेन जलेन नद्यः पूर्णाभूत्वा समुद्रं गच्छन्ति तथा राजा शत्रून् हत्वाऽस्तं नयेत्

इस मंत्र में उपमालङ्कार है। जैसे मेघ संसार के प्रकाश के लिये वर्त्तमान सूर्य के प्रकाश को अकस्मात् पृथिवी से उठा और रोक कर उसके साथ युद्ध करते हुए के समान वर्त्तता है तो भी वह मेघ सूर्य के सामर्थ्य का पार नहीं पाता जब यह सूर्य मेघ को मारकर भूमि में गिरा देता है तब उसके शरीर के अवयवों से निकले हुए जलों से नदी पूर्ण होकर समुद्र में जा मिलती हैं। वैसे राजा को उचित हैं कि शत्रुओं को मारके निर्मूल करता रहे ॥

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