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Mantra Rig 01.032.004

MANTRA NUMBER:

Mantra 4 of Sukta 32 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 36 of Adhyaya 2 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 22 of Anuvaak 7 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

यदि॒न्द्राह॑न्प्रथम॒जामही॑ना॒मान्मा॒यिना॒ममि॑ना॒: प्रोत मा॒याः आत्सूर्यं॑ ज॒नय॒न्द्यामु॒षासं॑ ता॒दीत्ना॒ शत्रुं॒ किला॑ विवित्से

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

यदिन्द्राहन्प्रथमजामहीनामान्मायिनाममिनाः प्रोत मायाः आत्सूर्यं जनयन्द्यामुषासं तादीत्ना शत्रुं किला विवित्से

 

The Mantra's transliteration in English

yad indrāhan prathamajām ahīnām ān māyinām aminā prota māyā | āt sūrya janayan dyām uāsa tādītnā śatru na kilā vivitse 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

यत् इ॒न्द्र॒ अह॑न् प्र॒थ॒म॒ऽजाम् अही॑नाम् आत् मा॒यिना॑म् अमि॑नाः प्र उ॒त मा॒याः आत् सूर्य॑म् ज॒नय॑न् द्याम् उ॒षास॑म् ता॒दीत्ना॑ शत्रु॑म् किला॑ वि॒वि॒त्से॒

 

The Pada Paath - transliteration

yat | indra | ahan | prathama-jām | ahīnām | āt | māyinām | aminā | pra | uta | māyā | āt | sūryam | janayan | dyām | uāsam | tādītnā | śatrum | na | kilā | vivitse 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३२।०

मन्त्रविषयः-

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते।

फिर वह किस प्रकार का है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(यत्) यम्। सुपाम० इत्यमो लुक्। (इन्द्र) पदार्थविदारयितः सूर्यलोकसदृश (अहन्) जहि (प्रथमजाम्) सृष्टिकालयुगपदुत्पन्नं मेघम् (अहीनाम्) सर्पस्येव मेघावयवानाम् (आत्) अनन्तरम् (मायिनाम्) येषां मायानिर्माणं धनाकारं सूर्यप्रकाशाच्छादकं वा बहुविधं कर्म विद्यते तेषाम्। अत्र भृम्न्यर्थइनिः। (अमिनाः) निवारयेद्वा मीनातेर्निगमे। अ० ।३।१। इति ह्रस्वादेशश्च। (प्र) प्रकृष्टार्थे (उत) अपि (मायाः) अन्धकाराद्या इव (आत्) अद्भुते (सूर्य्यम्) किरणसमूहम् (जनयन्) प्रकटयन् सन् (द्याम्) प्रकाशमयं दिनम् (उषसम्) प्रातःसमयम्। अत्र वर्णव्यत्येन दीर्घत्वम्। (तादीत्ना) तदानीम्। अत्र पृषोदरादीनियथोपदिष्टम्। अ० ।३।१०। अनेन वर्णविपर्यासेनाकारस्थान ईकार ईकारस्थान आकारस्तुडागमः पूर्वस्यदीर्घश्च। (शत्रुम्) वैरिणम् (न) इव (किल) निश्चयार्थे। अत्र निपातस्यच इति दीर्घः। (विवित्से) अत्र व्यत्ययेनात्मनेपदम् ॥

हे सेनापते ! जैसे (इन्द्रः) सब पदार्थों को वीदीर्ण अर्थात् भिन्न-२ करनेवाला सूर्य्यलोक (अहीनाम्) छोटे-२ मेघों के मध्य में। (प्रथमजाम्) संसार के उत्पन्न होने समय में उत्पन्न हुए मेघ को (अहन्) हनन करता है। जिनकी (मायिनाम्) सूर्य्य के प्रकाश का आवरण करनेवाली बड़ी-२ घटा उठती हैं उन मेघों की (मायाः) उक्त अन्धकार रूप घटाओं को (प्रामिणाः) अच्छे प्रकार हरता है (तादीत्ना) तब (यत्) जिस (सूर्य्यम्) किरणसमूह (उषसम्) प्रातःकाल और (द्याम्) अपने प्रकाश को (प्रजनयन्) प्रगट करता हुआ दिन उत्पन्न करता है (न) वैसे ही तूं शत्रुओं को (विवित्से) प्राप्त होता हुआ उनकी छल कपट आदि मायाओं को हनन कर और उस समय सूर्यरूप न्याय को प्रसिद्ध करके सत्य विद्या के व्यवहाररूप सूर्य्य का प्रकाश किया कर ॥

 

अन्वयः-

हे सेनाराजँस्त्वमिन्द्रः सूर्य्योहीनां प्रथमजां मेघमहन् तेषां मायिनामहीनां मायादीन् प्रामिणाः तादीत्ना यद्यं सूर्य्यकिरणसमूहमुषसं द्यां च प्रजनयन् दिनं करोति नेव शत्रून्विवित्से तेषां माया हन्यास्तदानीं न्यायार्के प्रकटयन् सत्यविद्याचाराख्यं सवितारं जनय ॥

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमालङ्कारः। यथा कश्चिच्छत्रोर्बलछले निवार्य तं जित्वा स्वराज्ये सुखन्यायप्रकाशौ विस्तारयति तथैव सूर्योपि मेघस्य घनाकारं प्रकाशावरणं निवार्य स्वकिरणान् विस्तार्य मेघं  छित्वा तमो हत्वा स्वदीप्तिं प्रसिद्धीकरोति ॥ #[ स्खलितोऽत्रार्थोय-श्च ह लि प्रेस पुस्तके ‘विन्दसि’ इति रुपेण वर्तते। सं] 

इस मंत्र में उपमालंकार है। जैसे कोई राजपुरुष अपने वैरियों के बल और छल का निवारण कर और उनको जीत के अपने राज्य में सुख तथा न्याय का प्रकाश करता है वैसे ही सूर्य भी मेघ की घटाओं को घनता और अपने प्रकाश के ढाँपनेवाले मेघ को निवारण कर अपनी किरणों को फैला मेघ को छिन्न-भिन्न और अन्धकार को दूर कर अपनी दीप्ति को प्रसिद्ध करता है ॥

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