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Mantra Rig 01.032.002

MANTRA NUMBER:

Mantra 2 of Sukta 32 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 36 of Adhyaya 2 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 20 of Anuvaak 7 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अह॒न्नहिं॒ पर्व॑ते शिश्रिया॒णं त्वष्टा॑स्मै॒ वज्रं॑ स्व॒र्यं॑ ततक्ष वा॒श्रा इ॑व धे॒नव॒: स्यन्द॑माना॒ अञ्ज॑: समु॒द्रमव॑ जग्मु॒राप॑:

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अहन्नहिं पर्वते शिश्रियाणं त्वष्टास्मै वज्रं स्वर्यं ततक्ष वाश्रा इव धेनवः स्यन्दमाना अञ्जः समुद्रमव जग्मुरापः

 

The Mantra's transliteration in English

ahann ahim parvate śiśriyāa tvaṣṭāsmai vajra svarya tataka | vāśrā iva dhenava syandamānā añja samudram ava jagmur āpa ॥

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अह॑न् अहि॑म् पर्व॑ते शि॒श्रि॒या॒णम् त्वष्टा॑ अ॒स्मै॒ वज्र॑म् स्व॒र्य॑म् त॒त॒क्ष॒ वा॒श्राःऽइ॑व धे॒नवः॑ स्यन्द॑मानाः अञ्जः॑ स॒मु॒द्रम् अव॑ ज॒ग्मुः॒ आपः॑

 

The Pada Paath - transliteration

ahan | ahim | parvate | śiśriyāam | tvaṣṭā | asmai | vajram | svaryam | tataka | vāśrā-iva | dhenava | syandamānā | añja | samudram | ava | jagmu | āpaḥ ॥


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३२।०२

मन्त्रविषयः-

पुनः स किं करोतीत्युपदिश्यते।

फिर वह सूर्य्य तथा सभापति क्या करता है। इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(अहन्) हतवान् हन्ति हनिष्यति वा (अहिम्) मेघमिवशत्रुम् (पर्वते) मेघमण्डले इव गिरौ। पर्वत इति मेघनामसु पठितम्। निघं० १।१०। (शिश्रियाणम्) विविधाश्रयम्। (त्वष्टा) स्वकिरणैः छेदनसूक्ष्मकर्त्ता स्वतेजोभिःशचुविदारको वा। (अस्मै) मेघाय दुष्टाय वा (वज्रम्) छेदनस्वभावं किरणसमूहं शस्त्रवृन्दं वा (स्वर्यम्) स्वरे गर्जने वाचि वा साधुस्तम्। स्वर इति वाङ्नामसु पठितम्। निघं० १।११। इदं पदं सायणाचार्येण मिथ्यैव व्याख्यातम्। (ततक्ष) छिनत्ति। (वाश्रा इव) वत्सप्राप्तिमुत्कंठिताःशब्दायमाना इव (धेनवः) गावः। (स्यन्दमानाः) प्रस्रवन्त्यः (अञ्जः) व्यक्तागमनशीला वा। अञ्जूव्यक्तिकरण इत्यस्य प्रयोगः। (समुद्रम्) जलेन पूर्णं सागरमन्तरिक्षं वा (अव) नीचार्थे (जग्मुः) गच्छन्ति (आपः) जलानि शत्रुप्राणा वा ॥२॥

जैसे यह (त्वष्टा) सूर्य्यलोक (पर्वते) मेघमण्डल में (शिश्रियाणम्) रहनेवाले (स्वर्य्यम्) गर्जनशील (अहिम्) मेघ को (अहन्) मारता है (अस्मै) इस मेघ के लिये (वज्रम्) काटने के स्वभाववाले किरणों को (ततक्ष) छोड़ता है। इस कर्म से (वाश्रा धेनव इव) बछरो को प्रीतिपूर्वक वा चाहती हुई गौओं के समान (स्यन्दमानाः) चलते हुए (अंजः) प्रकट (आपः) जल (समुद्रम्) जल से पूर्ण समुद्र को (अवजग्मुः) नदियों के द्वारा जाते हैं। वैसे ही सभाध्यक्ष राजा को चाहिये कि किला में रहनेवाले दुष्ट शत्रु को मारे इस शत्रु के लिये उत्तम शस्त्र छोड़े इस प्रकार उसके बछरों को चाहनेवाली गौओं के समान चलते हुए प्रसिद्ध प्राणों को अन्तरिक्ष में प्राप्त करे उन कण्टक शत्रुओं को मार के प्रजा को सुख देवे ॥२॥

 

अन्वयः-

यथा ऽयं त्वष्टा सूर्य्यलोकः पर्वते शिश्रियाणं स्वर्य्यमहिमहन् हन्ति। अस्मै मेधाय वज्रं ततक्ष तक्षति। एतेन कर्मणा वाश्रा धेनव इव स्यन्दमाना अंज आपः समुद्रमवजग्मुरवगच्छन्ति। तथैव सभाध्यक्षो राजा दुर्गमाश्रितं शत्रुं हन्यादस्मै शत्रवे वज्रं तक्षेत्तेन वाश्रा धेनव इव स्यन्दमाना अंज आपः समुद्रमवगमयेत् ॥२॥

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमालङ्कारः। यथा सूर्यःस्वकिरणैरंतरिक्षस्थं मेघं भूमौ निपात्य जगज्जीवयति तथा सेनेशोदुर्गपर्वताद्याश्रितमपि शत्रुं पृथिव्यां संपात्य प्रजाः सततं सुखयति ॥२॥

इस मंत्र में उपमालंकार है। जैसे सूर्य्य अपनी किरणों से अन्तरिक्ष में रहनेवाले मेघ को भूमि पर गिराकर जगत् को जिआता है वैसे ही सेनापति किला पर्वत आदि में रहनेवाले भी शत्रु को पृथिवी में गिरा के प्रजा को निरन्तर सुखी करता है ॥२॥


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