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Mantra Rig 01.031.018

MANTRA NUMBER:

Mantra 18 of Sukta 31 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 35 of Adhyaya 2 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 18 of Anuvaak 7 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- निचृत्त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- धैवतः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

ए॒तेना॑ग्ने॒ ब्रह्म॑णा वावृधस्व॒ शक्ती॑ वा॒ यत्ते॑ चकृ॒मा वि॒दा वा॑ उ॒त प्र णे॑ष्य॒भि वस्यो॑ अ॒स्मान्त्सं न॑: सृज सुम॒त्या वाज॑वत्या

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

एतेनाग्ने ब्रह्मणा वावृधस्व शक्ती वा यत्ते चकृमा विदा वा उत प्र णेष्यभि वस्यो अस्मान्त्सं नः सृज सुमत्या वाजवत्या

 

The Mantra's transliteration in English

etenāgne brahmaā vāvdhasva śaktī vā yat te cakmā vidā vā | uta pra ey abhi vasyo asmān sa na sja sumatyā vājavatyā 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

ए॒तेन॑ अ॒ग्ने॒ ब्रह्म॑णा व॒वृ॒ध॒स्व॒ शक्ती॑ वा॒ यत् ते॒ च॒कृ॒म वि॒दा वा॒ उ॒त प्र ने॒षि॒ अ॒भि वस्यः॑ अ॒स्मान् सम् नः॒ सृ॒ज॒ सु॒ऽम॒त्या वाज॑ऽवत्या

 

The Pada Paath - transliteration

etena | agne | brahmaā | vavdhasva | śaktī | vā | yat | te | cakma | vidā | vā | uta | pra | nei | abhi | vasya | asmān | sam | na | sja | su-matyā | vāja-vatyā 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३१।१८

मन्त्रविषयः

पुनः स कीदृशो भवेदित्याह।

फिर वह कैसा हो, इसका प्रकाश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः

(एतेन) वक्ष्यमाणेन (अग्ने) पाठशालाध्यापक (ब्रह्मणा) वेदेन (वावृधस्व) भृशमेधस्वैधय वा अत्र वृधुधातो#र्लेटिमध्यमैकवचने विकरणव्यत्ययेन श्लुरोरत्त्वमन्येषामपि दृश्यत इति दीर्घः (शक्ती) आत्मसामर्थ्येन अत्र सुपां सुलुगिति तृतीयैक वचनस्य पूर्वसवर्णादेशः (वा) शरीरबलेन (यत्) आज्ञापालनाख्यं कर्म (ते) तव (चकृम) कुर्महे अत्र लडर्थे लिट्। अन्येषामपि दृश्यत इतिदीर्घः (विदा) विदन्ति येन ज्ञानेन अत्र कृतो बहुलमिति करणे क्विप् (वा) योगक्रियया (उत) अपि (प्र) प्रकृष्टार्थे (नेषि) नयसि अत्र बहुलं छन्दसीति शपोलुक् (अभि) आभिमुख्ये (वस्यः) अतिशयेन धनमत्र वसुशब्दादीयसुन् प्रत्ययः। छान्दसो वर्णलोपो वेतकारलोपः (अस्मान्) विद्या धर्माचरणयुक्तान् विदुषो धार्मिकान् मनुष्यान् (सम्) एकीभावे (नः) अस्मभ्यम् (सृज) निष्पादय (सुमत्या) शोभनाचासौ मतिर्विचारो यस्यां तया (वाजवत्या) वाजः प्रशस्तमन्नं युद्धं विज्ञानं वा विद्यते यस्यां तया ॥१८॥  #[लोटि। सं०]

हे (अग्ने) सर्वोत्कृष्ट विद्वन् आप (ब्रह्मणा) वेदविद्या (वाजवत्या) उत्तम अन्नयुद्ध और विज्ञान वा (सुमत्या) श्रेष्ठविचार युक्त से (नः) हमारे लिये (वस्यः) अत्यन्त धन (अभिसृज) सब प्रकार से प्रकट कीजिये (उत) और आप (विदा) अपने उत्तम ज्ञान से (ववृधस्व) नित्य-नित्य उन्नति को प्राप्त हूजिये (ते) आपका (यत्) जो प्रेम है वह हम लोग (चकृम) करें और आप (अस्मान्) हम लोगों को (प्रणेषि) श्रेष्ठ बोध को प्राप्त कीजिये ॥१८॥  [इसके आगे और (शक्ती) शक्ति सेऐसा पाठ और होना चाहिये जो भूल से छूट गया है। सं०]

 

अन्वयः

हे अग्ने विद्वद्वर्यं त्वं ब्रह्मणा वाजवत्या सुमत्या शक्ती-*शक्त्यामिवस्य मभिसृजत्वमुतविदावावृधस्वते तव यत् प्रियाचरणं तद्वयं चकृम त्वं चास्मान् प्रणेषि सद्बोधं प्रापयसि ॥१८॥ *[“शक्तया नो वस्योभिसृजइति पाठेन भाव्यम्। सं०]

 

 

भावार्थः

ये मनुष्या वेदरीत्या धर्म्यं व्यवहारं कुर्वन्ति ते ज्ञानवन्तः सुमतयो धार्मिका भूत्वा यं धार्मिकमुत्तमं विपश्चितं सेवन्ते स तान् श्रेष्ठ सामर्थ्य सद्विद्या युक्तान् सम्पादयतीति ॥१८॥ 

अत्र सूक्त इन्द्रापनुयोगिनः खलु प्राधान्येनेश्वरस्य गौण्यावृत्या भौतिकस्यार्थस्य प्रकाशनात् पूर्वसूक्तार्थेन सहैतस्य सङ्गतिरस्तीति बोध्यम् ॥ 

इति प्रथमस्य द्वितीये पञ्चत्रिंशोवर्गः ॥३५॥ 

प्रथममण्डले सप्तमेनुवाके एकत्रिंशं सूक्तं च समाप्तम् ॥३१॥

जो मनुष्य वेद की रीति से धर्मयुक्त व्यवहार को करते हैं वे ज्ञानवान् और श्रेष्ठमतिवाले होकर उत्तम विद्वान् की सेवा करते हैं वह उनको श्रेष्ठ सामर्थ्य और उत्तम विद्या संयुक्त करता है ॥१८॥ 

इस सूक्त में सभा सेनापति आदि के अनुयोगी अर्थों के प्रकाश से पिछले सूक्त के साथ इस सूक्त की संगति जाननी चाहिये। 

यह पहिले अष्टक में दूसरे अध्याय में पैंतीसवां ३५ वर्ग वा पहिले मण्डल में सातवें अनुवाक में इकत्तीसवां सूक्त समाप्त हुआ ॥३१॥

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