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Mantra Rig 01.031.012

MANTRA NUMBER:

Mantra 12 of Sukta 31 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 34 of Adhyaya 2 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 12 of Anuvaak 7 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- त्रिष्टुप्

स्वर: (Swar) :- निषादः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

त्वं नो॑ अग्ने॒ तव॑ देव पा॒युभि॑र्म॒घोनो॑ रक्ष त॒न्व॑श्च वन्द्य त्रा॒ता तो॒कस्य॒ तन॑ये॒ गवा॑म॒स्यनि॑मेषं॒ रक्ष॑माण॒स्तव॑ व्र॒ते

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

त्वं नो अग्ने तव देव पायुभिर्मघोनो रक्ष तन्वश्च वन्द्य त्राता तोकस्य तनये गवामस्यनिमेषं रक्षमाणस्तव व्रते

 

The Mantra's transliteration in English

tva no agne tava deva pāyubhir maghono raka tanvaś ca vandya | trātā tokasya tanaye gavām asy animea rakamāas tava vrate 

 

The Pada Paath (Sanskrit)

त्वम् नः॒ अ॒ग्ने॒ तव॑ दे॒व॒ पा॒युऽभिः॑ म॒घोनः॑ र॒क्ष॒ त॒न्वः॑ च॒ व॒न्द्य॒ त्रा॒ता तो॒कस्य॑ तन॑ये गवा॑म् अ॒सि॒ अनि॑ऽमेषम् रक्ष॑माणः तव॑ व्र॒ते

 

The Pada Paath - transliteration

tvam | na | agne | tava | deva | pāyu-bhi | maghona | raka | tanva | ca | vandya | trātā | tokasya | tanaye | gavām | asi | ani-meam | rakamāa | tava | vrate 


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३१।१२

मन्त्रविषयः

पुनः स एवोपदिश्यते।

अगले मन्त्र में भी सेनापति का उपदेश किया है।

 

पदार्थः

(त्वम्) सभेशः (नः) अस्माकमस्मान्वा (अग्ने) सर्वाभिरक्षक (तव) सभाधिपतेः (देव) सर्वसुखदातः (पायुभिः) रक्षादिव्यवहारैः (मघोनः) मघं प्रशस्तं धनं विद्यते येषां तान् अत्र प्रशंसार्थे मतुप् मघमिति धननामधेयम् निरु० २। (रक्ष) पालय (तन्वः) शरीराणि। अत्र सुपांसुलुगिति शसः स्थाने जस् (वन्द्य) स्तोतुमर्ह (त्राता) रक्षकः (तोकस्य) अपत्यस्य। तोकमित्यपत्यनामसु पठितम् निघं० २।२ (तनये) विद्याशरीरबलवर्द्धनाय प्रवर्त्तमाने पुत्रे। तनयमित्यपत्यनामसु पठितम् निघं० २। (गवाम्) मनआदिन्द्रियाणां चतुष्पदां वा (अस्य) प्रत्यक्षाप्रत्यक्षस्य संसारस्य (अनिमेषम्) प्रतिक्षणम् (रक्षमाणः) रक्षन् सन्। अत्रव्यत्ययेन शानच् (तव) प्रजेश्वरस्य (व्रते) सत्यपालनादिनियमे ॥१२॥

हे (देव) सब सुख देने और (वन्द्य) स्तुति करने योग्य (अग्ने) तथा यथोचित सबकी रक्षा करनेवाले सभेश्वर (तव) सर्वाधिपति आपके (व्रते) सत्यपालन आदि नियम में प्रवृत्त और (मघोनः) प्रशंनीय धनयुक्त (नः) हम लोगों को और (नः) हमारे (तन्वः) शरीरों को (पायुभिः) उत्तम रक्षादि व्यवहारों से (अनिमेषम्) प्रतिक्षण (रक्ष) पालिये। (रक्षमाणः) रक्षा करते हुए आप जो कि आपके उक्त नियम में वर्त्तमान (तोकस्य) छोटे-छोटे बालक वा (गवाम्) प्राणियों की मन  आदि इन्द्रियां और गाय बैल आदि पशु हैं उनके तथा (अस्य) सब चराचर जगत् के प्रतिक्षण (त्राता) रक्षक अर्थात् अत्यन्त आनन्द देनेवाले हूजिये ॥१२॥  

 

अन्वयः-

हे देव वन्द्याग्ने सभेश्वर तव व्रते# वर्त्तमानान् मघोनोनोस्मान् अस्माकं वा तन्वस्तनुंश्च पायुभिस्त्वमनिमेषं रक्ष तथा रक्षमाणस्त्वं तव व्रते वर्त्तमानस्य तोकस्य गवामस्य संसारस्य चानिमेषं च तनये त्राता भव ॥१२॥ # [व्रते इत्यस्मादग्रे नीतिनियमेइत्यधिकः पाठो ह० लि० प्रेस पुस्तके। सं०]

 

 

भावार्थः-

सभापतीराजा परमेश्वरस्य जगद्धारणपालनादिगुणैरिवोत्तमगुणै राज्यनियमप्रवृत्ताञ्जनान् सततं रक्षेत् ॥१२॥

सभापति राजा ईश्वर के जो संसार की धारणा और पालना आदि गुण हैं उनके तुल्य उत्तम गुणों से अपने राज्य के नियम में प्रवृत्त जनों की निरन्तर रक्षा करें ॥१२॥

                                               

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