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Mantra Rig 01.031.011

MANTRA NUMBER:

Mantra 11 of Sukta 31 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 34 of Adhyaya 2 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 11 of Anuvaak 7 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- हिरण्यस्तूप आङ्गिरसः

देवता (Devataa) :- अग्निः

छन्द: (Chhand) :- निचृज्जगती

स्वर: (Swar) :- निषादः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

त्वाम॑ग्ने प्रथ॒ममा॒युमा॒यवे॑ दे॒वा अ॑कृण्व॒न्नहु॑षस्य वि॒श्पति॑म् इळा॑मकृण्व॒न्मनु॑षस्य॒ शास॑नीं पि॒तुर्यत्पु॒त्रो मम॑कस्य॒ जाय॑ते

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

त्वामग्ने प्रथममायुमायवे देवा अकृण्वन्नहुषस्य विश्पतिम् इळामकृण्वन्मनुषस्य शासनीं पितुर्यत्पुत्रो ममकस्य जायते

 

The Mantra's transliteration in English

tvām agne prathamam āyum āyave devā akṛṇvan nahuasya viśpatim | iām akṛṇvan manuasya śāsanīm pitur yat putro mamakasya jāyate ॥

 

The Pada Paath (Sanskrit)

त्वाम् अ॒ग्ने॒ प्र॒थ॒मम् आ॒युम् आ॒यवे॑ दे॒वाः अ॒कृ॒ण्व॒न् नहु॑षस्य वि॒श्पति॑म् इळा॑म् अ॒कृ॒ण्व॒न् मनु॑षस्य शास॑नीम् पि॒तुः यत् पु॒त्रः मम॑कस्य जाय॑ते

 

The Pada Paath - transliteration

tvām | agne | prathamam | āyum | āyave | devā | akṛṇvan | nahuasya | viśpatim | iām | akṛṇvan | manuasya | śāsanīm | pitu | yat | putra | mamakasya | jāyate ॥


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०३१।११

मन्त्रविषयः

पुनः स कीदृशः किं कुर्यादित्युपदिश्यते।

फिर वह क्या है, और क्या करे, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थ

(त्वाम्) प्रजापतिम् (अग्ने) विज्ञानान्वित (प्रथमम्) सर्वेष्वग्रगन्तारम् (आयुम्) य एति न्यायेन प्रजां तं यन्तं गच्छन्तम् (आयवे) यथा विज्ञानाय (देवाः) विद्वांसः (अकृण्वन्) कुर्युः। अत्र लिङर्थेलङ् (नहुषस्य) मनुष्यस्य नहुष इति मनुष्यनामसु पठितम् निघं० २।३ नहुषस्येत्यत्र सायणाचार्येण नहुषनामकराजविशेषो गृहीतस्तदसत्। कस्यचिन्नहुषस्येदानीं तनत्वाद् वेदानां सनातनत्वात्तस्यगाथात्र न सम्भवति निघण्टौ नहुषस्येति मनुष्यनाम्नः प्रसिद्धेश्च (विश्पतिम्) विशां प्रजानां पतिं पालकं सर्वोत्तमं राजानां (इळाम्) वेद चतुष्टयीं वाचम्। इळेति वाङ्नामसु पठितम् निघं० १।११ (अकृण्वन्) कुर्युः (मनुषस्य) मनुष्यस्य अत्र मन्धातोर्बाहुलकादुषन् प्रत्ययः (शासनीम्) शास्ति सर्वान् विद्याधर्माचरणशीलान् यया सत्यनीत्या ताम् अत्रापि सायणाचार्येण मनोः पुत्रीगृहीता तदप्यशुद्धमेव (पितुः) जनकस्य सकाशात् (यत्) यथा सुपां सुलुगिति तृतीयैक वचनस्य लुक् (पुत्रः) यः पितृपावनशीलः (ममकस्य) मादृशस्य अत्र बाहुलकान् मन्धातोर्दमकन्प्रत्ययः (जायते) उद्यते ॥११॥ 

*हे अग्नेविज्ञानयुक्त सभाध्यक्ष (देवाः) विद्वानों ने (नहुषस्य) मनुष्य की (आयवे) विज्ञान वृद्धि के लिये इस (इळाम्) वेदवाणी को (अकृण्वन्) प्रकाशित किया तथा (मनुष्यस्य) मनुष्यमात्र को (शासनीम्) सत्य शिक्षा को (अकृण्वन्) प्रकाशित किया और (यत्) जैसे (ममकस्य) हम लोग (पितुः) पिता होते हैं उनका (पुत्रः) पुत्र अपने शील से पितृवर्ग को पवित्र करनेवाला (जायते) उत्पन्न होता है वैसे राजवर्गों के प्रजाजन होते हैं ॥११॥ * [हिन्दी पदार्थ में भी (त्वाम्) (प्रथमम्) (आयुम्) (विश्पतिम्) यह चार शब्द तथा उनका अर्थ छूट गया है। ह० लि० प्रेस कापी के हिन्दी पदार्थ में उपर्युक्त चारों शब्द तथा उनके अर्थ तो नहीं छूटे परन्तु मुद्रित हि० पदार्थ से पाठ भेद अवश्य है जो कि निम्न प्रकार है- हे (अग्ने) अमृतस्वरूप सभापते ! तू जैसे (देवाः) विद्वान् लोग (शासनीम्) सत्यासत्य के निर्णय का निमित्त (इलाम्) चार वेदों की वाणी को (अकृण्वन्) करें। (नहुषस्य) मनुष्य के (आयवे) विशेष ज्ञान के लिये (शासनीम्) जिससे सब विद्या और धर्माचार युक्तनीति से उसको ग्रहण करके (प्रथमम्) अनादि स्वरूप जिस न्याय से प्रजा योग्य (आयुम्) प्राप्त होवे (विश्पतिम्) प्रजा पुत्र आदिकों के रक्षा करनेवाले सभापति राजा को चारों वेदों की वाणी व सत्य व्यवस्था को (अकृण्वन्) प्रकाशित करते हैं वैसे ही (ममकस्य) ज्ञानवान् (नहुषस्य) मनुष्य की जो वेद वाणी है उसको आप प्रकाशित कीजिये। सं०]

 

अन्वयः

#हे अग्ने विज्ञानान्वितसभाध्यक्ष देवा नहुषस्यायव इमामिळामकृण्वन् विशदीमकुर्वन् मनुष्यस्य शासनीं सत्यशिक्षां चाकृण्वन्। प्रजा च यत्यथा ममकस्य पितुः पुत्रो जायते तथा भवति ॥११॥ # [अन्वये त्वाम् प्रथमम् आयुम् विश्पतिम् इत्येते चत्वारसशब्दास्तेषामर्थश्चस्खलिता सन्ति। ह०लि० प्रेस पुस्तके तू त्वांविहाय नैतेषां स्खलनमभूत् परमन्वये पाठ भेदो वर्तते तच्चेत्थम्।सं० “हे अग्ने यथा देवा विद्वांसो नहुषस्य शासनीमिलामकृण्वन् ममकस्य मनुष्यस्य प्रथमायुं विश्पतिं न्यायाधीशं सभापतिं राजानमकृण्वन् तथा पितुः पुत्रो जायते तथा धार्मिकेण राज्ञा प्रजा पालनीयाः।अस्मिन् पाठे आयवेशब्दस्य पाठो न वर्त्तते। सं०]

 

 

भावार्थः

नैवेश्वरप्रणीतेन व्यवस्थापकेन वेदशास्त्रेण राजनीत्या च विना प्रजापालकः प्रजां पालयितुं शक्नोति प्रजाजनस्य राज्ञोज्ञसन्तानवद्भवत्यतः सभापती राजाज्ञ पुत्रमिव प्रजां शिष्यात् ॥११॥

ईश्वरोक्त व्यवस्था करनेवाले वेदशास्त्र और राजनीति के बिना प्रजा पालनेहारा सभापति राजा प्रजा नहीं पाल सकता है और प्रजा राजा के अज्ञ सन्तान के तुल्य होती है इससे सभापति राजा पुत्र के समान प्रजा को शिक्षा देवे ॥११॥

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