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Mantra Rig 01.028.009

MANTRA NUMBER:

Mantra 9 of Sukta 28 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 26 of Adhyaya 2 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 68 of Anuvaak 6 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- शुनःशेप आजीगर्तिः

देवता (Devataa) :- इन्द्रयज्ञसोमाः

छन्द: (Chhand) :- गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

उच्छि॒ष्टं च॒म्वो॑र्भर॒ सोमं॑ प॒वित्र॒ सृ॑ज नि धे॑हि॒ गोरधि॑ त्व॒चि

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

उच्छिष्टं चम्वोर्भर सोमं पवित्र सृज नि धेहि गोरधि त्वचि

 

The Mantra's transliteration in English

uc chiṣṭa camvor bhara somam pavitra ā sja | ni dhehi gor adhi tvaci ॥

 

The Pada Paath (Sanskrit)

उत् शि॒ष्टम् च॒म्वोः॑ भ॒र॒ सोम॑म् प॒वित्रे॑ सृ॒ज॒ नि धे॒हि॒ गोः अधि॑ त्व॒चि

 

The Pada Paath - transliteration

ut | śiṣṭam | camvo | bhara | somam | pavitre | ā | sja | ni | dhehi | go | adhi | tvaci ॥


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१०२८०९

मन्त्रविषयः-

पुनस्ताभ्यां किं किं साधनीयमित्युपदिश्यते।

फिर उनसे क्या-क्या सिद्ध करना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(उत्) उत्कृष्टार्थे क्रियायोगे (शिष्टम्) शिष्यते यस्तम् (चम्बोः) पदाति हस्त्यश्वादिरूयोः सेनयोरिव (भर) धर (सोमम्) सर्वरोगनाशकबलपुष्टिबुद्धि-वर्द्धकमुत्तमौषध्यभिषवम् (पवित्रे) शुद्धेसेविते (आ) समन्तात् (सृज) निष्पादय (नि) नितराम् (धेहि) संस्थापय (गोः) पृथिव्याः। गौरिति पृथिवीनामसु पठितम्। निघं० १।१ (अधि) उपरि (त्वचि) पृष्ठे ॥९॥

हे विद्वान् ! तुम (चम्बोः) पैदर और सवारों की सेनाओं के समान (शिष्टम्) शिक्षा करने योग्य (सोमम्) सर्व रोगविनाशक बलपुष्टि और बुद्धि को बढ़ानेवाले उत्तम ओषधि के रस को (उद्भर) उत्कृष्टता से धारण कर उससे दो सेनाओं को (पवित्रे) उत्तम (आसृज) कीजिये (गोः) पृथिवी के (अधि) ऊपर अर्थात् (त्वचि) उसकी पीठ पर उन सेनाओं को (निधेहि) स्थापन करो ॥९॥

 

अन्वयः-

हे विद्वँस्त्वं चम्बोरिव शिष्टं सोममुद्भर तेनोभेसेने पवित्रे आसृज गोः पृथिव्या अधि त्वचि ते निधेहि नितरां सँस्थापय ॥९॥

 

 

भावार्थः-

राजपुरुषादिभिर्द्विविधे सेने सम्पादनीये एकायानारूढ़ा द्वितीया पदातिरूपा तदर्थ-मुत्तमा रसाः शस्त्रादिसामग्र्यश्च सम्पादनीयाः सुशिक्षयौषधादिदानेन च शुद्धबले सर्वरोगरहिते संगृहा पृथिव्या उपरि चक्रवर्त्तिराज्यं नित्यं सेवनीयमिति ॥९॥ 

सप्तविंशेन सूक्तेनाग्निर्विद्वाँसश्चोक्तास्तैर्मुसलोलूखलादीनि साधनानि गृहीत्वौषध्यादिभ्यो जगत्स्थपदार्थेभ्यो बहुविधा उत्तमाः पदार्थाः सम्पादनीया इत्यस्मिन्सूक्ते प्रतिपादनात् सप्तविंशसूक्तोक्तार्थेन सहास्याष्टाविंशसूक्तार्थस्य संगतिरस्तीति बोध्यम् ॥ 

इति प्रथमाष्टके द्वितीयाध्यये षड्विंशोवर्गः ॥२६॥ प्रथममण्डले षष्ठेऽनुवाकेऽष्टाविंशं सूक्तं च समाप्तम् ॥२८॥

राजपुरुषों को चाहिये कि दो प्रकार की सेना रखें अर्थात् एक तो सवारों की और दूसरी पैदरों की उनके लिये उत्तम रस और शस्त्र आदि सामग्री इकट्ठी करें अच्छी शिक्षा और ओषधि देकर शुद्ध बलयुक्त और नीरोग कर पृथिवी पर एक चक्रराज्य नित्य करें ॥९॥ 

सत्ताईसवें सूक्त से अग्नि और विद्वान् जिस-जिस गुण को कहे हैं वे मूसल और ऊखली आदि साधनों को ग्रहण कर ओषध्यादि पदार्थों से संसार के पदार्थों से अनेक प्रकार के उत्तम-उत्तम पदार्थ उत्पन्न करें 

इस अर्थ का इस सूक्त में सम्पादन करने से सत्ताईसवें सूक्त के कहे हु अर्थ के साथ अट्ठाईसवें सूक्त की संगति है यह जानना चाहिये ॥

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