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Mantra Rig 01.028.007

MANTRA NUMBER:

Mantra 7 of Sukta 28 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 26 of Adhyaya 2 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 66 of Anuvaak 6 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- शुनःशेप आजीगर्तिः

देवता (Devataa) :- इन्द्रयज्ञसोमाः

छन्द: (Chhand) :- गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

आ॒य॒जी वा॑ज॒सात॑मा॒ ता ह्यु१॒॑च्चा वि॑जर्भृ॒तः हरी॑ इ॒वान्धां॑सि॒ बप्स॑ता

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

आयजी वाजसातमा ता ह्युच्चा विजर्भृतः हरी इवान्धांसि बप्सता

 

The Mantra's transliteration in English

āyajī vājasātamā tā hy uccā vijarbhta | harī ivāndhāsi bapsatā ॥

 

The Pada Paath (Sanskrit)

आ॒य॒जी इत्या॑ऽय॒जी वा॒ज॒ऽसात॑मा ता हि उ॒च्चा वि॒ऽज॒र्भृ॒तः हरी॑ इ॒वेति॒ हरी॑ऽइव अन्धां॑सि बप्स॑ता

 

The Pada Paath - transliteration

āyajī ity āyajī | vāja-sātamā | tā | hi | uccā | vi-jarbhta | harīivetiharī-iva | andhāsi | bapsatā ॥


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१०२८०७

मन्त्रविषयः-

पुनर्मुसलोलूखले कीदृशे स्त इत्युपदिश्यते।

फिर मुसल और उलूखल कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(आयजी) समन्ताद्यज्यन्ते संगम्यंते पदार्था याभ्यां तौ स्त्रीपुरुषौ। अत्र बाहुलकादौणादिकः करणकारके इः प्रत्ययः (वाजसातमा) वाजान् युद्धसमूहान् सनन्ति संभज्य विजयन्ते याभ्यां तावतिशयितौ। अत्र सर्वत्र सुपांसुलुगित्याकारादेशः (ता) तौ (हि) खलु (उच्चा) उत्कृष्टानि कार्याणि। अत्र शेश्छन्दसीति शेर्लोपः (विजर्भृतः) विविधं धरतः (हरीइव) यथाऽश्वौ तथा (अंधांसि) अन्नानि। अन्ध इत्यन्ननामसु पठितम्। निघं० २।७ (बप्सता) बप्संतौ अत्र भसभर्त्स नदीप्त्योरित्यस्माल्लटः शत्रादेशः। घसिभसोर्हलि च अ० ६।४।१०० अनेनोपधालोपः सुगममन्यत्। भस धातोर्भर्त्सन इत्यर्थो नवीनो भक्षण इति प्राचीनोऽर्थः ॥७॥

(आयजी) जो अच्छे प्रकार पदार्थों को प्राप्त होनेवाले (वाजसातमा) संग्रामों को जीतते हैं (ता) वे स्त्री पुरुष (अंधांसि) अन्नों को (बप्सता) खाते हु (हरी) घोड़ों के (इव) समान उलूखल आदि से (उच्चा) जो अति उत्तम काम हैं उनको (विजर्भृतः) अनेक प्रकार से सिद्धकर धारण करते रहें ॥७॥

 

अन्वयः-

यावायजी वाजसातमौ स्तस्तौ स्त्रीपुरुषावंधांसि बप्सन्तौ भक्षयन्तौ हरीइव मुसलोलूखलादिभ्य उच्चा-उत्कृष्टानि कार्याणि विजर्भृतः ॥७॥

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमालंकारः। यथा भक्षणकर्त्तारावश्वौ यानादीनि वहतस्तथैव मुसलोलूखले वहूनि विभागकरणादीनि कार्याणि प्रापयत इति ॥७॥

इस मन्त्र में उपमालंकार है। जैसे खाने वाले घोड़े रथ आदि को बहते हैं वैसे ही मुसल और ऊखरी से पदार्थों को अलग-अलग करने आदि अनेक कार्यों को सिद्ध करते हैं ॥७॥

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