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Mantra Rig 01.028.004

MANTRA NUMBER:

Mantra 4 of Sukta 28 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 25 of Adhyaya 2 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 63 of Anuvaak 6 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- शुनःशेप आजीगर्तिः

देवता (Devataa) :- इन्द्रयज्ञसोमाः

छन्द: (Chhand) :- अनुष्टुप्

स्वर: (Swar) :- गान्धारः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

यत्र॒ मन्थां॑ विब॒ध्नते॑ र॒श्मीन्यमि॑त॒वा इ॑व उ॒लूख॑लसुताना॒मवेद्वि॑न्द्र जल्गुलः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

यत्र मन्थां विबध्नते रश्मीन्यमितवा इव उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः

 

The Mantra's transliteration in English

yatra manthā vibadhnate raśmīn yamitavā iva | ulūkhalasutānām aved v indra jalgula ॥

 

The Pada Paath (Sanskrit)

यत्र॑ मन्था॑म् वि॒ऽब॒ध्नते॑ र॒श्मीन् यमि॑त॒वैऽइ॑व उ॒लूख॑लऽसुतानाम् अव॑ इत् ऊँ॒ इति॑ इ॒न्द्र॒ ज॒ल्गु॒लः॒

 

The Pada Paath - transliteration

yatra | manthām | vi-badhnate | raśmīn | yamitavai-iva | ulūkhala-sutānām | ava | it | o iti | indra | jalgulaḥ ॥


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१०२८०४

मन्त्रविषयः-

एतत्सम्बन्ध्यन्यदपि साधनमुपदिश्यते।

इसके सम्बन्धी और भी साधन का अगले मन्त्र में उपदेश किया है।


पदार्थः-

(यत्र) यस्मिन् क्रियासाध्ये व्यवहारे (मंन्थाम्) घृतादिनिस्सारणं मन्थानम्। अत्र छान्दसो वर्णलोपो वेति नकारलोपः (विबध्नते) विशिष्टतया बध्नन्ति। अत्र व्यत्ययेनात्मनेपदम् (रश्मीन्) रज्जूः (यमितवाइव) निग्रहीतुमर्हइव। अत्र यम धातोस्तवै प्रत्ययः। वा छन्दसि सर्वे विधयो भवन्तीतीडागमः (उलूखलसुतानाम्) उलूखलेन सम्पादितानां प्राप्तिम्। उलूखलशब्दार्थं यास्कमुनिरेवं समाचष्टे। उलूखलमुरुकरं वोर्करं वोर्ध्वखं वोरुमे कुर्वित्यब्रबीत् तदुलूखलमभवत् उरुकरं वैतदुलूखलमित्याचक्षते। निरु० ९।२० (अव) इच्छ (इत्) निश्चये (उ) वितर्के (इन्द्र) रसाभिसिंचन् जीव (जल्गुलः) शब्दय। सिद्धिः पूर्ववत् ॥४॥

हे (इन्द्र) सुख की इच्छा करनेवाले विद्वान् मनुष्य ! तू (रश्मीन्) (इव) जैसे (यमितवै) सूर्य्य अपनी किरणों को वा सारथी जैसे घोड़े आदि पशुओं की रस्सियों को (यत्र) जिस क्रिया से सिद्ध होनेवाले व्यवहार में (मन्थाम्) घृत आदि पदार्थों के निकालने के लिये मन्थनियों को (विबध्नते) अच्छे प्रकार बांधते हैं वहाँ (उलूखलसुतानाम्) उलूखल से सिद्ध हु पदार्थों को (अव) वैसे ही सिद्ध करने की इच्छाकर (उ) और (इत्) उसी विद्या को (जल्गुलः) युक्ति के साथ उपदेश कर ॥४॥

 

अन्वयः-

हे इन्द्र सुखाभिलाषिन्विद्वंस्त्वं रश्मीन् यमितवै सूर्यो वा सारथिरिव यत्र मन्थां विबध्नते तत्रोलूखलसुतानां प्राप्तिमवेच्छ। एतामिदुविद्यां युक्त्या जल्गुलः शब्दयोपदिश ॥४॥

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमालंकारः। ईश्वर उपदिशति हे विद्वांसो यथा सूर्यो रश्मिभिर्भूमिमाकर्षणेन बध्नाति यथा सारथीज्जुभिरश्वान् नियच्छति तथैव मंथनबन्धनचालनविद्यया दुग्धादिभ्य ओषधिभ्यश्च नवनीतादिसारान् युक्त्या निष्पादयतेति ॥४॥

इस मन्त्र में उपमालंकार है। ईश्वर उपदेश करता है कि हे विद्वानो ! जैसे सूर्य अपनी किरणों के साथ भूमि को आकर्षण शक्ति से बांधता और जैसे सारथी स्सियों से घोड़ों को नियम में रखता है वैसे ही मथने बांधने और चलाने की विद्या से दूध आदि वा ओषधि आदि पदार्थों से मक्खन आदि पदार्थों को युक्ति के साथ सिद्ध करो ॥४॥

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