Rig Veda‎ > ‎Mandal 01‎ > ‎Sukta 028‎ > ‎

Mantra Rig 01.028.003

MANTRA NUMBER:

Mantra 3 of Sukta 28 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 25 of Adhyaya 2 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 62 of Anuvaak 6 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- शुनःशेप आजीगर्तिः

देवता (Devataa) :- इन्द्रयज्ञसोमाः

छन्द: (Chhand) :- अनुष्टुप्

स्वर: (Swar) :- गान्धारः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

यत्र॒ नार्य॑पच्य॒वमु॑पच्य॒वं च॒ शिक्ष॑ते उ॒लूख॑लसुताना॒मवेद्वि॑न्द्र जल्गुलः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

यत्र नार्यपच्यवमुपच्यवं शिक्षते उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः

 

The Mantra's transliteration in English

yatra nāry apacyavam upacyava ca śikate | ulūkhalasutānām aved v indra jalgula ॥

 

The Pada Paath (Sanskrit)

यत्र॑ नारी॑ अ॒प॒ऽच्य॒वम् उ॒प॒ऽच्य॒वम् च॒ शिक्ष॑ते उ॒लूख॑लऽसुतानाम् अव॑ इत् ऊँ॒ इति॑ इ॒न्द्र॒ ज॒ल्गु॒लः॒

 

The Pada Paath - transliteration

yatra | nārī | apa-cyavam | upa-cyavam | ca | śikate | ulūkhala-sutānām | ava | it | o iti | indra | jalgulaḥ ॥


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१०२८०३

मन्त्रविषयः-

अथेयं विद्या कथं ग्राह्येत्युपदिश्यते।

अब अगले मन्त्र में यह विद्या कैसे ग्रहण करनी चाहिये, इस विषय का उपदेश किया है।

 

पदार्थः-

(यत्र) यस्मिन्कर्मणि (नारी) नरस्य पत्नी गृहमध्ये (अपच्यवम्) त्यागम् (उपच्यवम्) प्रापणम्। च्युङ्गतावित्यस्य प्रयोगौ (च) तत् क्रियाकरणशिक्षादेः समुच्चये (शिक्षते) ग्राहयति (उलूखलसुतानाम्) उलूखलेनोत्पादितानाम् (अव) जानीहि (इत्) एव (उ) जिज्ञासने (इन्द्र) इन्द्रियाधिष्ठातर्जीव (जल्गुलः) शृणूपदिश च। सिद्धिः पूर्ववत् ॥३॥

हे (इन्द्र) इन्द्रियों के स्वामी जीव ! तू (यत्र) जि कर्म में घर के बीच (नारी) स्त्रियाँ काम करनेवाली अपनी संगिस्त्रियों के लिये (उलूखलसुतानाम्) उक्त उलूखलों से सिद्ध की हुई विद्या को (अपच्यवम्) (उपच्यवम्) (च) अर्थात् जैसे डालना निकालनादि क्रिया करनी होती है वैसे उस विद्या को (शिक्षते) शिक्षा से ग्रहण करतीं और करातीं हैं उसको (उ) अनेक तर्कों के साथ (जल्गुलः) सुनो और इस विद्या का उपदेश करो ॥३॥

 

अन्वयः-

हे इन्द्र त्वं यत्र नारीकर्मकारीभ्य उलूखलसुतानामपच्यवमुपच्यवं च शिक्षते तद्विद्यामुपादत्ते तत्र तदेतत्सर्वमुइदेवजल्गुलः शृण्वेता उपदिश च ॥३॥

 

 

भावार्थः-

उलूखलादिविद्याया भोजनादिसाधिकाया गृहसम्बन्धिकार्यकारित्वादेषा स्त्रीभिर्नित्यं ग्राह्याऽन्याभ्यो ग्राहयितव्या च यत्र पाकक्रिया साध्यते तत्रैतानि स्थापनीयानि नैतैर्विना कुट्टनपेषणादिक्रियाः सिध्यन्तीति ॥३॥

यह उलूखलविद्या जो कि भोजनादि के पदार्थ सिद्ध करनेवाली है गृह-सम्बन्धि कार्य करनेवाली होने से यह विद्या स्त्रियों को नित्य ग्रहण करनी और अन्य स्त्रियों को सिखाना भी चाहिये जहाँ पाक सिद्ध किये जाते हों वहाँ ये सब उलूखल आदि साधन स्थापन करने चाहिये क्योंकि इनके बिना कूटना पीसना आदि क्रिया सिद्ध नहीं हो सकती ॥३॥

Comments