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Mantra Rig 01.028.002

MANTRA NUMBER:

Mantra 2 of Sukta 28 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 25 of Adhyaya 2 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 61 of Anuvaak 6 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- शुनःशेप आजीगर्तिः

देवता (Devataa) :- इन्द्रयज्ञसोमाः

छन्द: (Chhand) :- अनुष्टुप्

स्वर: (Swar) :- गान्धारः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

यत्र॒ द्वावि॑व ज॒घना॑धिषव॒ण्या॑ कृ॒ता उ॒लूख॑लसुताना॒मवेद्वि॑न्द्र जल्गुलः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

यत्र द्वाविव जघनाधिषवण्या कृता उलूखलसुतानामवेद्विन्द्र जल्गुलः

 

The Mantra's transliteration in English

yatra dvāv iva jaghanādhiavayā ktā | ulūkhalasutānām aved v indra jalgula ॥

 

The Pada Paath (Sanskrit)

यत्र॑ द्वौऽइ॑व ज॒घना॑ अ॒धि॒ऽस॒व॒न्या॑ कृ॒ता उ॒लूख॑लऽसुतानाम् अव॑ इत् ऊँ॒ इति॑ इ॒न्द्र॒ ज॒ल्गु॒लः॒

 

The Pada Paath - transliteration

yatra | dvau-iva | jaghanā | adhi-savanyā | ktā | ulūkhala-sutānām | ava | it | o iti | indra | jalgulaḥ ॥


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१०२८०२

मन्त्रविषयः-

पुनस्ते कीदृशा इत्युपदिश्यते।

फिर वे कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(यत्र) यस्मिन्व्यवहारे (द्वाविव) उभे यथा (जघना) ऊरुणी। जघनं जंघन्यतेः। निरु० ९।२० अत्र हन्तेः शरीरावयवे द्वे च। उ० ५।३२ अनेनाच् प्रत्ययो द्वित्वं सुपांसुलुगिति त्रिषु विभक्तेराकारादेशश्च (अधिषवण्या) अधिगतं सुन्वन्ति याभ्यां ते अधिषवणी तयोर्भवे। अत्र भवे छन्दसि अ० ४।४।११०। इति यत् (कृता) कृते (उलूखलसुतानाम्) उलूखलेन शोधितानाम् (अव) प्राप्नुहि (इत्) एव (उ) वितर्के (इन्द्र) अन्तःकरण बहिष्करणशरीरादिसाधनैश्वर्य्यवन् मनुष्य (जल्गुलः) अतिशयेन शब्दय। सिद्धिः पूर्ववत् ॥२॥

हे (इन्द्र) भीतर बाहर के शरीर साधनों से ऐश्वर्य्य वाले विद्वान् मनुष्य ! तुम (द्वाविव) (जघना) दो जंघों के समान (यत्र) जिस व्यवहार में (अधिषवण्या) अच्छे प्रकार वा असार अलग-अलग करने के पात्र अर्थात् शिलवट्टे होते हैं उनको (कृता) अच्छे प्रकार सिद्ध करके (उलूखलसुतानाम्) शिलवट्टे से शुद्ध किये हु पदार्थों के सकाश से सार को (अव) प्राप्त हो (उ) और उत्तम विचार से (इत्) उसीको (जल्गुलः) बार-बार पदार्थों पर चला ॥२॥

 

अन्वयः-

हे इन्द्र विद्वंस्त्वं यत्र द्वे जङ्घे इव अधिषवण्ये फलके कृते भवस्ते सम्यक् कृत्वोलूखलसुतानां पदार्थानां सकाशात् सारमव। प्राप्नुहि उवितर्के इत् तदेव जल्गुलः पुनः पुनः शब्दयः ॥२॥

 

 

भावार्थः-

अत्रोपमालंकारः। मनुष्यैर्यथा द्वाभ्यामुरुभ्यां गमनादिका क्रिया निष्पाद्यन्ते तथैव पाषाणस्याध एका स्थूला शिला स्थापनार्था द्वितीया हस्तेनोपरि पेषणार्था कार्ये ताभ्यामोषधीनां पेषणं कृत्वा यथावद्भक्षणादि संसाध्य भक्षणीयमिदमपि मुसलोलूखलवद्द्वितीयं साधनं रचनीयमिति ॥२॥

इस मन्त्र में उपमालंकार है। मनुष्यों को योग्य है कि जैसे दोनों जांघों के सहाय से मार्ग का चलना-चलाना सिद्ध होता है वैसे ही एक तो पत्थर की शिला नीचे रखें और दूसरा ऊपर से पीसने के लिये बट्टा जिसको हाथ में लेकर पदार्थ पीसे जायें इनसे ओषधि आदि पदार्थों को पीसकर यथावत् भक्ष्य आदि पदार्थों को सिद्ध करके खावें यह भी दूसरा साधन उखली मुसल के समान बनाना चाहिये ॥२॥

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