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Mantra Rig 01.025.018

MANTRA NUMBER:

Mantra 18 of Sukta 25 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 19 of Adhyaya 2 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 33 of Anuvaak 6 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- शुनःशेप आजीगर्तिः

देवता (Devataa) :- वरुणः

छन्द: (Chhand) :- गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

दर्शं॒ नु वि॒श्वद॑र्शतं॒ दर्शं॒ रथ॒मधि॒ क्षमि॑ ए॒ता जु॑षत मे॒ गिर॑:

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

दर्शं नु विश्वदर्शतं दर्शं रथमधि क्षमि एता जुषत मे गिरः

 

The Mantra's transliteration in English

darśa nu viśvadarśata darśa ratham adhi kami | etā juata me gira ॥

 

The Pada Paath (Sanskrit)

दर्श॑म् नु वि॒श्वऽद॑र्शतम् दर्श॑म् रथ॑म् अधि॑ क्षमि॑ ए॒ताः जु॒ष॒त॒ मे॒ गिरः॑

 

The Pada Paath - transliteration

darśam | nu | viśva-darśatam | darśam | ratham | adhi | kami | etā | juata | me | giraḥ ॥


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०२५।१८

मन्त्रविषयः

पुनस्ते किं किं कुर्युरित्युपदिश्यते।

फिर भी वे क्या-क्या करें, इस विषय का प्रकाश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः

(दर्शम्) पुनः पुनर्द्रष्टुम् (नु) अनुपृष्टे (विश्वदर्शतम्) सर्वैर्विद्वद्भिर्द्रष्टव्यं जगदीश्वरम् (दर्शम्) पुनः पुनः सम्प्रेक्षितुम् (रथम्) रमणीयं विमानादियानम् (अधि) उपरिभावे (क्षमि) क्षाम्यन्ति सहन्ते जना यस्मिन् व्यवहारे तस्मिन् स्थित्वा। अत्र कृतो बहुलम् इत्यधिकरणे क्विप्। वा छन्दसि सर्वे विधयो भवन्ति इति अनुनासिकस्य क्विझलोः क्ङिति। (अष्टा०६.४.१५) इति दीर्घो न भवति (एताः) वेदविद्यासुशिक्षासंस्कृताः (जुषत) सेवध्वम् (मे) मम (गिरः) वाणीः ॥१८॥

हे मनुष्यो ! तुम (अधिक्षमि) जिन व्यवहारों में उत्तम और निकृष्ट बातों का सहना होता है, उनमें ठहर कर (विश्वदर्शतम्) जो कि विद्वानों की ज्ञानदृष्टि से देखने के योग्य परमेश्वर है उसको (दर्शम्) बारंबार देखने (रथम्) विमान आदि यानों को (नु) भी (दर्शम्) पुनः-पुनः देख के सिद्ध करने के लिये (मे) मेरी (गिरः) वाणियों को (जुषत) सदा सेवन करो ॥१८॥

 

अन्वयः

हे मनुष्या ! यूयमधि क्षमि स्थित्वा विश्वदर्शतं वरुणं परेशं दर्शं रथं नु दर्शं मे ममैता गिरो वाणीर्जुषत नित्यं सेवध्वम् ॥१८॥

 

 

भावार्थः

यस्मात् क्षमादिगुणसहितैर्मनुष्यैः प्रश्नोत्तर-व्यवहारेणानुष्ठानेन विनेश्वरं शिल्पविद्यासिद्धानि यानानि च वेदितुं न शक्यानि, तत्र ये गुणास्तेऽपि चास्मादेतेषां विज्ञानाय सर्वदा प्रयतितव्यम् ॥१८॥

जिससे क्षमा आदि गुणों से युक्त मनुष्यों को यह जानना योग्य है कि प्रश्न और उत्तर के व्यवहार के किये विना परमेश्वर को जानने और शिल्पविद्या सिद्ध विमानादि रथों को कभी बनाने को शक्य नहीं और जो उनमें गुण हैं, वे भी इससे इनके विज्ञान होने के लिये सदैव प्रयत्न करना चाहिये ॥१८॥






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