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Mantra Rig 01.025.015

MANTRA NUMBER:

Mantra 15 of Sukta 25 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 18 of Adhyaya 2 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 30 of Anuvaak 6 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- शुनःशेप आजीगर्तिः

देवता (Devataa) :- वरुणः

छन्द: (Chhand) :- पादनिचृद्गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

उ॒त यो मानु॑षे॒ष्वा यश॑श्च॒क्रे असा॒म्या अ॒स्माक॑मु॒दरे॒ष्वा

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

उत यो मानुषेष्वा यशश्चक्रे असाम्या अस्माकमुदरेष्वा

 

The Mantra's transliteration in English

uta yo mānuev ā yaśaś cakre asāmy ā | asmākam udarev ā ॥

 

The Pada Paath (Sanskrit)

उ॒त यः मानु॑षेषु यशः॑ च॒क्रे असा॑मि अ॒स्माक॑म् उ॒दरे॑षु

 

The Pada Paath - transliteration

uta | ya | mānueu | ā | yaśa | cakre | asāmi | ā | asmākam | udareu | ā ॥


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०२५।१५

मन्त्रविषयः

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते।

फिर वह वरुण किस प्रकार का है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः

(उत) अपि (यः) जगदीश्वरो वायुर्वा (मानुषेषु) नृव्यक्तिषु (आ) अभितः (यशः) कीर्त्तिमन्नं वा। यश इत्यन्ननामसु पठितम्। (निघं०२.७) (चक्रे) कृतवान् (असामि) समस्तम् (आ) समन्तात् (अस्माकम्) मनुष्यादिप्राणिनम् (उदरेषु) अन्तर्देशेषु (आ) अभितोऽर्थे ॥१५॥

(यः) जो हमारे (उदरेषु) अर्थात् भीतर (उत) और बाहर भी (असामि) पूर्ण (यशः) प्रशंसा के योग्य कर्म को (आचक्रे) सब प्रकार से करता है, जो (मानुषेषु) जीवों और जड़ पदार्थों में सर्वथा कीर्त्ति को किया करता है, सो वरुण अर्थात् परमात्मा वा विद्वान् सब मनुष्यों को उपासनीय और सेवनीय क्यों न होवे ॥१५॥

 

अन्वयः

योऽस्माकमुदरेषूतापि बहिरसामि यश आचक्रे यो मानुषेषु जीवेषूतापि जडेषु पदार्थेष्वाकीर्त्तिं प्रकाशितवानस्ति, स वरुणो जगदीश्वरो विद्वान् वा सकलैर्मानवैः कुतो नोपासनीयो जायेत ॥१५॥

 

 

भावार्थः

येन सृष्टिकर्त्तान्तर्यामिणा जगदीश्वरेण परोपकाराय जीवानां तत्तकर्मफलभोगाय समस्तं जगत्प्रतिकल्पं विरच्यते, यस्य सृष्टौ बाह्याभ्यन्तरस्थो वायुः सर्वचेष्टा हेतुरस्ति, विद्वांसो विद्याप्रकाशका अविद्याहन्तारश्च प्रायतन्ते, तदिदं धन्यवादार्हं कर्म परमेश्वरस्यैवाखिलैर्मनुष्यैर्विज्ञेयम् ॥१५॥

जिस सृष्टि करनेवाले अन्तर्यामी जगदीश्वर ने परोपकार वा जीवों को उनके कर्म के अनुसार भोग कराने के लिये सम्पूर्ण जगत् कल्प-कल्प में रचा है, जिसकी सृष्टि में पदार्थों के बाहर-भीतर चलनेवाला वायु सब कर्मों का हेतु है और विद्वान् लोग विद्या का प्रकाश और अविद्या का हनन करनेवाले प्रयत्न कर रहे हैं, इसलिये इस परमेश्वर के धन्यवाद के योग्य कर्म सब मनुष्यों को जानना चाहिये ॥१५॥






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