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Mantra Rig 01.025.014

MANTRA NUMBER:

Mantra 14 of Sukta 25 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 18 of Adhyaya 2 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 29 of Anuvaak 6 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- शुनःशेप आजीगर्तिः

देवता (Devataa) :- वरुणः

छन्द: (Chhand) :- निचृद्गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

यं दिप्स॑न्ति दि॒प्सवो॒ द्रुह्वा॑णो॒ जना॑नाम् दे॒वम॒भिमा॑तयः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

यं दिप्सन्ति दिप्सवो द्रुह्वाणो जनानाम् देवमभिमातयः

 

The Mantra's transliteration in English

na ya dipsanti dipsavo na druhvāo janānām | na devam abhimātaya ॥

 

The Pada Paath (Sanskrit)

यम् दिप्स॑न्ति दि॒प्सवः द्रुह्वा॑णः जना॑नाम् दे॒वम् अ॒भिऽमा॑तयः

 

The Pada Paath - transliteration

na | yam | dipsanti | dipsava | na | druhvāa | janānām | na | devam | abhi-mātayaḥ ॥


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०२५।१४

मन्त्रविषयः

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते।

फिर वह वरुण किस प्रकार का है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः

(न) निषेधे (यम्) वरुणं परमेश्वरं विद्वांसं वा (दिप्सन्ति) विरोद्धुमिच्छन्ति। (दिप्सवः) मिथ्याभिमानव्यवहारमिच्छवः शत्रवः। अत्रोभयत्र वर्णव्यत्ययेन धकारस्य दकारः। (न) प्रतिषेधे (द्रुह्वाणः) द्रोहकर्त्तारः (न) निवारणे (देवम्) दिव्यगुणं (अभिमातयः) अभिमानिनः। ‘मा माने’ इत्यस्य रूपम् ॥१४॥

हे मनुष्यो ! तुम सब लोग (जनानाम्) विद्वान् धार्मिक वा मनुष्य आदि प्राणियों से (दिप्सवः) झूठे अभिमान और झूठे व्यवहार को चाहनेवाले शत्रुजन (यम्) जिस (देवम्) दिव्य गुणवाले परमेश्वर वा विद्वान् को (न) (दिप्सन्ति) विरोध से न चाहें (द्रुह्वाणः) द्रोह करनेवाले जिस को द्रोह से (न) चाहें तथा जिसके साथ (अभिमातयः) अभिमानी पुरुष (न) अभिमान से न वर्त्तें, उन उपासना करने योग्य परमेश्वर वा विद्वानों को जानो ॥१४॥

 

अन्वयः

हे मनुष्या ! यूयं जनानां दिप्सवो यं न दिप्सन्ति द्रुह्वाणो यं न द्रुह्यन्त्यभिमातयो यं नाभिमन्यन्ते तं परमेश्वरं देवमुपास्यं कार्य्यहेतुं विद्वांसं वा सर्वे जानीत ॥१४॥

 

 

भावार्थः

अत्र श्लेषालङ्कारः। ये हिंसका परद्रोहयुक्ता अभिमानसहिता जना वर्त्तन्ते, ते विद्याहीनत्वात् परमेश्वरस्य विदुषां वा गुणान् ज्ञात्वा नैवोपकर्त्तुमर्हन्ति, तस्मात् सर्वैरेतेषां गुणकर्मस्वभावैः सह सदा भवितव्यम् ॥१४॥

इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जो हिंसक परद्रोही अभिमानयुक्त जन हैं, वे अज्ञानपन से परमेश्वर वा विद्वानों के गुणों को जान कर उनसे उपकार लेने को समर्थ नहीं हो सकते। इसलिये सब मनुष्यों को योग्य है कि उनके गुण, कर्म और स्वभाव का सदैव ग्रहण करें ॥१४॥






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