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Mantra Rig 01.025.010

MANTRA NUMBER:

Mantra 10 of Sukta 25 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 17 of Adhyaya 2 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 25 of Anuvaak 6 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- शुनःशेप आजीगर्तिः

देवता (Devataa) :- वरुणः

छन्द: (Chhand) :- प्रतिष्ठागायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

नि ष॑साद धृ॒तव्र॑तो॒ वरु॑णः प॒स्त्या॒३॒॑स्वा साम्रा॑ज्याय सु॒क्रतु॑:

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

नि षसाद धृतव्रतो वरुणः पस्त्यास्वा साम्राज्याय सुक्रतुः

 

The Mantra's transliteration in English

ni asāda dhtavrato varua pastyāsv ā | sāmrājyāya sukratu ॥

 

The Pada Paath (Sanskrit)

नि स॒सा॒द॒ धृ॒तऽव्र॑तः वरु॑णः प॒स्त्या॑सु साम्ऽरा॑ज्याय सु॒ऽक्रतुः॑

 

The Pada Paath - transliteration

ni | sasāda | dhta-vrata | varua | pastyāsu | ā | sām-rājyāya | su-kratuḥ ॥


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०२५।१०

मन्त्रविषयः

य एतं जानाति स किं प्राप्नोतीत्युपदिश्यते।

जो मनुष्य इस वायु को ठीक-ठीक जानता है, वह किसको प्राप्त होता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः

(नि) नित्यार्थे (ससाद) तिष्ठति। अत्र लडर्थे लिट्। सदेः परस्य लिटि। (अष्टा०८.३.१०७) अनेन परसकारस्य मूर्द्धन्यादेशनिषेधः। (धृतव्रतः) सत्याचारशीलः (वरुणः) उत्तमो विद्वान् (पस्त्यासु) पस्त्येभ्यो गृहेभ्यो हितास्तासु प्रजासु। पस्त्यमिति गृहनामसु पठितम्। (निघं०३.४) (आ) समन्तात् (साम्राज्याय) यद्राष्ट्रं सर्वत्र भूगोले सम्यक् राजते प्रकाशते तस्य भावाय (सुक्रतुः) शोभनाः क्रतवः कर्माणि प्रज्ञा वा यस्य सः ॥१०॥

जैसे जो (धृतव्रतः) सत्य नियम पालने (सुक्रतुः) अच्छे-अच्छे कर्म वा उत्तम बुद्धियुक्त (वरुणः) अति श्रेष्ठ सभा सेना का स्वामी (पस्त्यासु) अत्युत्तम घर आदि पदार्थों से युक्त प्रजाओं में (साम्राज्याय) चक्रवर्त्ती राज्य को करने की योग्यता से युक्त मनुष्य (आनिषसाद) अच्छे प्रकार स्थित होता है, वैसे ही हम लोगों को भी होना चाहिये ॥१०॥

 

अन्वयः

यथा यो धृतव्रतः सुक्रतुर्वरुणो विद्वान् मनुष्यः पस्त्यासु प्रजासु साम्राज्यायानिषसाद तथाऽस्माभिरपि भवितव्यम् ॥१०॥

 

 

भावार्थः

अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा परमेश्वरः सर्वासां प्रजानां सम्राड् वर्त्तते तथा य ईश्वराज्ञायां वर्त्तमानो विद्वान् धार्मिकः शरीरबुद्धिबलसंयुक्तो मनुष्यो भवति स एव साम्राज्यं कर्तुमर्हतीति ॥१०॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे परमेश्वर सब प्राणियों का उत्तम राजा है, वैसे जो ईश्वर की आज्ञा में वर्त्तमान धार्मिक शरीर और बुद्धि बलयुक्त मनुष्य हैं, वे ही उत्तम राज्य करने योग्य होते हैं ॥१०॥






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