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Mantra Rig 01.020.007

MANTRA NUMBER:

Mantra 7 of Sukta 20 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 2 of Adhyaya 2 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 25 of Anuvaak 5 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- मेधातिथिः काण्वः

देवता (Devataa) :- ऋभवः

छन्द: (Chhand) :- गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

ते नो॒ रत्ना॑नि धत्तन॒ त्रिरा साप्ता॑नि सुन्व॒ते एक॑मेकं सुश॒स्तिभि॑:

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

ते नो रत्नानि धत्तन त्रिरा साप्तानि सुन्वते एकमेकं सुशस्तिभिः

 

The Mantra's transliteration in English

te no ratnāni dhattana trir ā sāptāni sunvate | ekam-eka suśastibhi ॥

 

The Pada Paath (Sanskrit)

ते नः॒ रत्ना॑नि ध॒त्त॒न॒ त्रिः साप्ता॑नि सु॒न्व॒ते एक॑म्ऽएकम् सु॒श॒स्तिऽभिः॑

 

The Pada Paath - transliteration

te | na | ratnāni | dhattana | tri | ā | sāptāni | sunvate | ekam-ekam | suśasti-bhiḥ ॥


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०२०।०७

मन्त्रविषयः-

एवं साधितैरेतैः किं फलं जायत इत्युपदिश्यते।

इस प्रकार से सिद्ध किये हुए इन पदार्थों से क्या फल सिद्ध होता है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(ते) मेधाविनः (नः) अस्मभ्यम् (रत्नानि) विद्यासुवर्णादीनि (धत्तन) दधतु। अत्र व्यत्ययः। तप्तनबिति तनबादेशश्च (त्रिः) पुनः-पुनः संख्यातव्ये (आ) समन्तात् (साप्तानि) सप्तवर्गाज्जातानि ब्रह्मचारिगृहस्थवानप्रस्थसंन्यासिनां यानि विशिष्टानि कर्माणि पूर्वोक्तस्य यज्ञस्यानुष्ठानं विद्वत्सत्कारसंगतिकरणे दानमर्थात्सर्वोपकरणाय विद्यादानमिति सप्त। (सुन्वते) निष्पाद्यन्ते (एकमेकम्) कर्मकर्म। अत्र वीप्सायां द्वित्वम्। (सुशस्तिभिः) शोभनाः शस्तयः यासां क्रियाणां ताभिः ॥७॥

जो विद्वान् (सुशस्तिभिः) अच्छी-२ प्रशंसावाली क्रियाओं से (साप्तानि) जो सात संख्या के वर्ग अर्थात् ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासियों के कर्म, यज्ञ का करना, विद्वानों का सत्कार तथा उनसे मिलाप और दान अर्थात् सबके उपकार के लिये विद्या का देना है, इनसे (एकमेकम्) एक-एक कर्म करके (त्रिः) त्रिगुणित सुखों को (सुन्वते) प्राप्त करते हैं (ते) वे बुद्धिमान् लोग (नः) हमारे लिये (रत्नानि) विद्या और सुवर्णादि धनों को (धत्तन) अच्छी प्रकार धारण करें ॥७॥

 

अन्वयः-

ये मेधाविनः सुशस्तिभिः साप्तान्येकमेकं कर्म कृत्वा सुखानि त्रिः सुन्वते ते नोऽस्मभ्यं रत्नानि धत्तन ॥७॥

 

 

भावार्थः-

सर्वैर्मनुष्यैश्चतुराश्रमाणां यानि चतुर्धा कर्माणि यानि च यज्ञानुष्ठानादीनि त्रीणि तानि मनोवाक्शरीरैः कर्त्तव्यानि एवं मिलित्वा सप्त जायन्ते। यैर्मनुष्यैरेतानि क्रियन्ते तेषां संयोगोपदेशप्राप्त्या विद्यया रत्नलाभेन सुखानि भवन्ति। परं त्वेकैकं कर्म संसेध्य समाप्य द्वितीयमिति क्रमेण शान्तिपुरुषार्थाभ्यां सेवनीयानीति ॥७॥

सब मनुष्यों को उचित है कि जो ब्रह्मचारी आदि चार आश्रमों के कर्म तथा यज्ञ के अनुष्ठान आदि तीन प्रकार के हैं, उनको मन वाणी और शरीर से यथावत् करें. इस प्रकार मिलकर सात कर्म होते हैं, जो मनुष्य इनको क्रिया करते हैं उनके संग उपदेश और विद्या से रत्नों को प्राप्त होकर सुखी होते हैं, वे एक-एक कर्म को सिद्ध वा समाप्त करके दूसरे का आरम्भ करें, इस क्रम से शान्ति और पुरुषार्थ से सब कर्मों का सेवन करते रहें ॥७॥

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