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Mantra Rig 01.020.004

MANTRA NUMBER:

Mantra 4 of Sukta 20 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 1 of Adhyaya 2 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 22 of Anuvaak 5 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- मेधातिथिः काण्वः

देवता (Devataa) :- ऋभवः

छन्द: (Chhand) :- निचृद्गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

युवा॑ना पि॒तरा॒ पुन॑: स॒त्यम॑न्त्रा ऋजू॒यव॑: ऋ॒भवो॑ वि॒ष्ट्य॑क्रत

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

युवाना पितरा पुनः सत्यमन्त्रा ऋजूयवः ऋभवो विष्ट्यक्रत

 

The Mantra's transliteration in English

yuvānā pitarā puna satyamantrā jūyava | bhavo viṣṭy akrata ||

 

The Pada Paath (Sanskrit)

युवा॑ना पि॒तरा॑ पुन॒रिति॑ स॒त्यऽम॑न्त्राः ऋ॒जू॒ऽयवः॑ ऋ॒भवः॑ वि॒ष्टी अ॒क्र॒त॒

 

The Pada Paath - transliteration

yuvānā | pitarā | punariti | satya-mantrā | jū-yava | bhava | viṣṭī | akrata  ||                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                

महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।२०।०४

मन्त्रविषयः-

पुनस्ते कीदृशा इत्युपदिश्यते।

फिर वे विद्वान् कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।


पदार्थः-

(युवाना) मिश्रामिश्रगुणस्वभावौ। अत्रोभयत्र सुपां सुलुगित्याकारादेशः (पितरा) शरीरात्मपालनहेतू (सत्यमन्त्राः) सत्यो यथार्थो मन्त्रो विचारो येषां ते (ॠजूयवः) कर्मभिरात्मन ॠजुत्वमिच्छन्तस्तच्छीलाः। अत्र क्याच्छन्दसीत्युः प्रत्ययः (ॠभवः) मेधाविनः ॠभव इति मेधाविनामसु पठितम्। निघं० ३।१५। (विष्टी) व्यापनशीलावश्विनौ। अत्र क्तिच् क्तौ च संज्ञायाम्। ० ३।३।१७४। अनेन क्तिच् प्रत्ययः (अक्रत) कुर्वन्ति। अत्र लडर्थे लुङ्। मन्त्रे घसह्वरण० अ० २।४८०। इति च्लेर्लुक् च

जो (ॠजूयवः) कर्मों से अपनी सरलता को चाहने और (सत्यमन्त्राः) सत्य अर्थात् यथार्थ विचार के करनेवाले (ॠभवः) बुद्धिमान् सज्जन हैं, वे (विष्टी) व्याप्त होने (युवाना) मेल-अमेल स्वभाववाले तथा (पितरा) पालनहेतु पूर्वोक्त अग्नि और जल को क्रिया की सिद्धि के लिये बारम्बार (अक्रत) अच्छी प्रकार प्रयुक्त करते हैं

 

अन्वयः-

य ॠजूयव: सत्यमन्त्रा ॠभवस्ते हि विष्टी युवाना पितराऽश्विनौ क्रियासित्ध्यर्थं पुन: पुनरक्रत संप्रयुक्तौ कुर्वन्ति

 

 

भावार्थः-

येऽनलसाः सन्तः सत्यप्रिया आर्जवयुक्ता मनुष्याः सन्ति त एवाग्निजलादिपदार्थेभ्य उपकारं ग्रहीतुं शक्नुवन्तीति

जो आलस्य को छोड़े हुये सत्य में प्रीति रखने और सरल बुद्धिवाले मनुष्य हैं, वे ही अग्नि और जल आदि पदार्थों से उपकार लेने को समर्थ हो सकते हैं

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