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Mantra Rig 01.020.002

MANTRA NUMBER:

Mantra 2 of Sukta 20 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 1 of Adhyaya 2 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 20 of Anuvaak 5 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- मेधातिथिः काण्वः

देवता (Devataa) :- ऋभवः

छन्द: (Chhand) :- गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

इन्द्रा॑य वचो॒युजा॑ तत॒क्षुर्मन॑सा॒ हरी॑ शमी॑भिर्य॒ज्ञमा॑शत

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

इन्द्राय वचोयुजा ततक्षुर्मनसा हरी शमीभिर्यज्ञमाशत

 

The Mantra's transliteration in English

ya indrāya vacoyujā tatakur manasā harī | śamībhir yajñam āśata ॥

 

The Pada Paath (Sanskrit)

ये इन्द्रा॑य व॒चः॒ऽयुजा॑ त॒त॒क्षुः मन॑सा हरी॒ इति॑ शमा॑ईभिः य॒ज्ञम् आ॒श॒त॒

 

The Pada Paath - transliteration

ye | indrāya | vaca-yujā | tataku | manasā | harī iti | śamāībhi | yajñam | āśata ॥


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।२०।०२

मन्त्रविष:-

पुनस्ते ॠभवः कीदृशा इत्युपदिश्यते

फिर वे विद्वान् कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(ये) ॠभवो मेधाविनः (इन्द्राय) ऐश्वर्य्यप्राप्तये (वचोयुजा) वचोभिर्युक्तः। अत्र सुपां सुलुगित्याकारादेशः (ततक्षुः) तनूकुर्वन्ति। अत्र लडर्थे लिट्। (मनसा) विज्ञानेन (हरी) गमनधारणगुणौ (शमीभिः) कर्मभिः। शमी इति कर्मनामसु पठितम्। निघ १। (यज्ञम्) पुरुषार्थसाध्यम् (आशत) प्राप्नुवन्ति। अत्र व्यत्ययो लडर्थे लङ् बहुलं छन्दसीति शपो लुकि श्नोरभावश्च ॥२॥

(ये) जो ॠभु अर्थात् उत्तम बुद्धिवाले विद्वान् लोग (मनसा) अपने विज्ञान से (वचोयुजा) वाणियों से सिद्ध किये हु (हरी) गमन और धारण गुणों को (ततक्षुः) अतिसूक्ष्म करते और उनको (शमीभिः) दण्डों को कलायन्त्रों को घुमा के (इन्द्राय) ऐश्वर्य्यप्राप्ति के लिये (यज्ञम्) पुरुषार्थ से सिद्ध करने योग्य यज्ञ को (आशत) परिपूर्ण करते हैं, वे सुखों को बढ़ा सकते हैं ॥२॥

 

अन्वयः-

ये मेधाविनो मनसा वचोयुजा हरी ततक्षुः शमीभिरिन्द्राय यज्ञमाशत प्राप्नुवन्ति ते सुखमेधन्ते ॥२॥

 

 

भावार्थः-

ये विद्वांसः पदार्थानां संयोगविभागाभ्यां धारणाकर्षणवेगादिगुणान् विदित्वा यन्त्रयष्टीभ्रामणक्रियाभिः शिल्पादियज्ञं निष्पादयन्ति त एव परमैश्वर्य्यं प्राप्नुवन्ति ॥२॥

जो विद्वान् पदार्थों के संयोग वा वियोग से धारण आकर्षण वा वेगादि गुणों को जानकर क्रियाओं से शिल्पव्यवहार आदि यज्ञ को सिद्ध करते हैं, वे ही उत्तम-२ ऐश्वर्य्य को प्राप्त होते हैं ॥२॥

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