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Mantra Rig 01.019.005

MANTRA NUMBER:

Mantra 5 of Sukta 19 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 36 of Adhyaya 1 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 14 of Anuvaak 5 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- मेधातिथिः काण्वः

देवता (Devataa) :- अग्निर्मरुतश्च

छन्द: (Chhand) :- गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

ये शु॒भ्रा घो॒रव॑र्पसः सुक्ष॒त्रासो॑ रि॒शाद॑सः म॒रुद्भि॑रग्न॒ ग॑हि

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

ये शुभ्रा घोरवर्पसः सुक्षत्रासो रिशादसः मरुद्भिरग्न गहि

 

The Mantra's transliteration in English

ye śubhrā ghoravarpasa sukatrāso riśādasa | marudbhir agna ā gahi ॥

 

The Pada Paath (Sanskrit)

ये शु॒भ्राः घो॒रऽव॑र्पसः सु॒ऽक्ष॒त्रासः॑ रि॒शाद॑सः म॒रुत्ऽभिः॑ अ॒ग्ने॒ ग॒हि॒

 

The Pada Paath - transliteration

ye | śubhrā | ghora-varpasa | su-katrāsa | riśādasa | marut-bhi | agne | ā | gahi ॥


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०१९।०५

मन्त्रविषयः

पुनस्ते कीदृशा इत्युपदिश्यते।

फिर भी उक्त वायु कैसे हैं, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-

 

पदार्थः

(ये) वायवः (शुभ्राः) स्वगुणैः शोभमानाः (घोरवर्पसः) घोरं हननशीलं वर्पो रूपं स्वरूपं येषां ते। वर्प इति रूपनामसु पठितम्। (निघं०३.७) (सुक्षत्रासः) शोभनं क्षत्रमन्तरिक्षस्थं राज्यं येषां ते (रिशादसः) रिशा रोगा अदसोऽत्तारो ये ते (मरुद्भिः) प्राप्तिहेतुभिः सह। मरुत इति पदनामसु पठितम्। (निघं०५.५) अनेनात्र प्राप्त्यर्थो गृह्यते। (अग्ने) भौतिकः (आ) आभिमुख्ये (गहि) प्रापयति ॥५॥

(ये) जो (घोरपर्वसः) घोर अर्थात् जिनका पदार्थों को छिन्न-भिन्न करनेवाला रूप जो और (रिशादसः) रोगों को नष्ट करनेवाले (सुक्षत्रासः) तथा अन्तरिक्ष में निर्भय राज्य करनेहारे और (शुभ्राः) अपने गुणों से सुशोभित पवन हैं, उनके साथ (अग्ने) भौतिक अग्नि (आगहि) प्रकट होता अर्थात् कार्य्यसिद्धि को देता है ॥५॥

 

अन्वयः

ये घोरवर्पसो रिशादसः सुक्षत्रासः शुभ्रा वायवः सन्ति, तैर्मरुद्भिः सहाग्नेऽग्निरागहि कार्य्याणि प्रापयति ॥५॥

 

 

भावार्थः

ये यज्ञेन शोधिता वायवः सुराज्यकारिणो भूत्वा रोगान् घ्नन्ति, ये चाशुद्धास्ते सुखानि नाशयन्ति, तस्मात्सर्वैर्मनुष्यैरग्निना वायोः शोधनेन सुखानि संसाधनीयानीति ॥५॥

जो यज्ञ के धूम से शोधे हुए पवन हैं, वे अच्छे राज्य के करानेवाले होकर रोग आदि दोषों का नाश करते हैं और जो अशुद्ध अर्थात् दुर्गन्ध आदि दोषों से भरे हुए हैं, वे सुखों का नाश करते हैं। इससे मनुष्यों को चाहिये कि अग्नि में होम द्वारा वायु की शुद्धि से अनेक प्रकार के सुखों को सिद्ध करें ॥५॥






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