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Mantra Rig 01.019.003

MANTRA NUMBER:

Mantra 3 of Sukta 19 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 36 of Adhyaya 1 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 12 of Anuvaak 5 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- मेधातिथिः काण्वः

देवता (Devataa) :- अग्निर्मरुतश्च

छन्द: (Chhand) :- गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

ये म॒हो रज॑सो वि॒दुर्विश्वे॑ दे॒वासो॑ अ॒द्रुह॑: म॒रुद्भि॑रग्न॒ ग॑हि

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

ये महो रजसो विदुर्विश्वे देवासो अद्रुहः मरुद्भिरग्न गहि

 

The Mantra's transliteration in English

ye maho rajaso vidur viśve devāso adruha | marudbhir agna ā gahi ॥

 

The Pada Paath (Sanskrit)

ये म॒हः रज॑सः वि॒दुः विश्वे॑ दे॒वासः॑ अ॒द्रुहः॑ म॒रुत्ऽभिः॑ अ॒ग्ने॒ ग॒हि॒

 

The Pada Paath - transliteration

ye | maha | rajasa | vidu | viśve | devāsa | adruha | marut-bhi | agne | ā | gahi ॥


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०१९।०३

मन्त्रविषयः

अथाग्निशब्देनैतयोर्गुणा उपदिश्यन्ते।

अगले मन्त्र में अग्निशब्द से ईश्वर और भौतिक अग्नि के गुणों का उपदेश किया है-

 

पदार्थः

(ये) मनुष्याः (महः) महसः। अत्र सुपां सुलुग्० इति शसो लुक्। (रजसः) लोकान्। यास्कमुनी रजःशब्दमेवं व्याख्यातवान्-रजो रजतेर्ज्योती रज उच्यत उदकं रज उच्यते लोका रजांस्युच्यन्तेऽसृगहनी रजसी उच्येते। (निरु०४.१९) (विदुः) जानन्ति (विश्वे) सर्वे (देवासः) विद्वांसः। अत्र आज्जसेरसुग्० इत्यसुगागमः। (अद्रुहः) द्रोहरहिताः (मरुद्भिः) वायुभिः सह (अग्ने) स्वयंप्रकाश ! सर्वलोकप्रकाशकोऽग्निर्वा (आ) समन्तात् (गहि) गच्छ गच्छति वा ॥३॥

(ये) जो (अद्रुहः) किसी से द्रोह न रखनेवाले (विश्वे) सब (देवासः) विद्वान् लोग हैं, जो कि (मरुद्भिः) पवन और अग्नि के साथ संयोग में (महः) बड़े-बड़े (रजसः) लोकों को (विदुः) जानते हैं, वे ही सुखी होते हैं। हे (अग्ने) स्वयंप्रकाश होनेवाले परमेश्वर ! आप (मरुद्भिः) पवनों के साथ (आगहि) विदित हूजिये, और जो आपका बनाया हुआ (अग्ने) सब लोकों का प्रकाश करनेवाला भौतिक अग्नि है, सो भी आपकी कृपा से (मरुद्भिः) पवनों के साथ कार्य्यसिद्धि के लिये (आगहि) प्राप्त होता है ॥३॥

 

अन्वयः

येऽद्रुहो विश्वेदेवासो विद्वांसो मरुद्भिरग्निना च संयुगे महो रजसो विदुस्त एव सुखिनः स्युः। हे अग्ने ! यस्त्वं मरुद्भिः सहागहि विदितो भवसि तेन त्वया योऽग्निर्निर्मितः मरुद्भिरेव कार्य्यार्थमागच्छति प्राप्तो भवति ॥३॥

 

 

भावार्थः

ये विद्वांसोऽग्निनाकृष्य प्रकाश्य मरुद्भिश्चेष्टयित्वा धारिता लोकाः सन्ति, तान् सर्वान् विदित्वा कार्य्येषूपयोक्तुं जानन्ति, ते सुखिनो भवन्तीति ॥३॥

जो विद्वान् लोग अग्नि से आकर्षण वा प्रकाश करके तथा पवनों से चेष्टा करके धारण किये हुए लोक हैं, उनको जानकर उनसे कार्य्यों में उपयोग लेने को जानते हैं, वे ही अत्यन्त सुखी होते हैं ॥३॥





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