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Mantra Rig 01.018.004

MANTRA NUMBER:

Mantra 4 of Sukta 18 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 34 of Adhyaya 1 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Anuvaak 5 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- मेधातिथिः काण्वः

देवता (Devataa) :- ब्रह्मणस्पतिरिन्द्रश्च सोमश्च

छन्द: (Chhand) :- निचृद्गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

घा॑ वी॒रो रि॑ष्यति॒ यमिन्द्रो॒ ब्रह्म॑ण॒स्पति॑: सोमो॑ हि॒नोति॒ मर्त्य॑म्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

घा वीरो रिष्यति यमिन्द्रो ब्रह्मणस्पतिः सोमो हिनोति मर्त्यम्

 

The Mantra's transliteration in English

sa ghā vīro na riyati yam indro brahmaas pati | somo hinoti martyam ॥

 

The Pada Paath (Sanskrit)

सः घ॒ वी॒रः रि॒ष्य॒ति॒ यम् इन्द्रः॑ ब्रह्म॑णः पतिः॑ सोमः॑ हि॒नोति॑ मर्त्य॑म्

 

The Pada Paath - transliteration

sa | gha | vīra | na | riyati | yam | indra | brahmaa | pati | soma | hinoti | martyam ॥


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

मन्त्र संख्याः

 

संस्कृत

हिन्दी

०१।०१८।०४

मन्त्रविषयः

अथेन्द्रादिकृत्यान्युपदिश्यन्ते ।

अगले मन्त्र में इन्द्रादिकों के कार्य्यों का उपदेश किया है-

 

पदार्थः

(सः) इन्द्रो बृहस्पतिः सोमश्च (घ) एव । ऋचि तुनुघ० इति दीर्घः । (वीरः) अजति व्याप्नोति शत्रुबलानि यः (न) निषेधार्थे (रिष्यति) नश्यति (यम्) प्राणिनम् (इन्द्रः) वायुः (ब्रह्मणः) ब्रह्माण्डस्य (पतिः) पालयिता परमेश्वरः (सोमः) सोमलतादिसमूहरसः (हिनोति) वर्धयति (मर्त्यम्) मनुष्यम् ॥४॥

उक्त इन्द्र (ब्रह्मणस्पतिः) ब्रह्माण्ड का पालन करनेवाला जगदीश्वर और (सोमः) सोमलता आदि ओषधियों का रससमूह (यम्) जिस (मर्त्यम्) मनुष्य आदि प्राणी को (हिनोति) उन्नतियुक्त करते हैं, (सः) वह (वीरः) शत्रुओं का जीतनेवाला वीर पुरुष (न घ रिष्यति) निश्चय है कि वह विनाश को प्राप्त कभी नहीं होता ॥४॥

 

अन्वयः

इन्द्रो ब्रह्मणस्पतिः सोमश्च यं मर्त्यं हिनोति स वीरो न घ रिष्यति नैव विनश्यति ॥४॥

 

 

भावार्थः

ये वायुविद्युत्सूर्य्यसोमौषधगुणान् सङ्गृह्य कार्य्याणि साधयन्ति न ते खलु नष्टसुखा भवन्तीति ॥४॥

जो मनुष्य वायु, विद्युत्, सूर्य्य और सोम आदि ओषधियों के गुणों को ग्रहण करके अपने कार्य्यों को सिद्ध करते हैं, वे कभी दुखी नहीं होते ॥४॥









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