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Mantra Rig 01.017.009

MANTRA NUMBER:

Mantra 9 of Sukta 17 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 4 of Varga 33 of Adhyaya 1 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 66 of Anuvaak 4 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- मेधातिथिः काण्वः

देवता (Devataa) :- इन्द्रावरुणौ

छन्द: (Chhand) :- गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

प्र वा॑मश्नोतु सुष्टु॒तिरिन्द्रा॑वरुण॒ यां हु॒वे यामृ॒धाथे॑ स॒धस्तु॑तिम्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

प्र वामश्नोतु सुष्टुतिरिन्द्रावरुण यां हुवे यामृधाथे सधस्तुतिम्

 

The Mantra's transliteration in English

pra vām aśnotu suṣṭutir indrāvarua yā huve | yām dhāthe sadhastutim ॥

 

The Pada Paath (Sanskrit)

प्र वा॒म् अ॒श्नो॒तु॒ सुऽस्तु॒तिः इन्द्रा॑वरुणा याम् हु॒वे याम् ऋ॒धाथे॑ इति॑ स॒धऽस्तु॑तिम्

 

The Pada Paath - transliteration

pra | vām | aśnotu | su-stuti | indrāvaruā | yām | huve | yām | dhātheiti | sadha-stutim ॥


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०१७।०९

मन्त्रविषयः-

एतयोर्यथायोग्यगुणस्तवनं कर्त्तव्यमित्युपदिश्यते।

उक्त इन्द्र और वरुण के यथायोग्य गुणकीर्त्तन करने की योग्यता का अगले मन्त्र में प्रकाश किया है।

 

पदार्थः-

(प्र) प्रकृष्टार्थे क्रियायोगे (वाम्) यौ तौ वा। अत्र व्यत्ययः। (अश्नोतुः) व्याप्नोतु। (सुष्टुतिः) शोभना चासौ गुणस्तुतिश्च सा। (इन्द्रावरुणा) पूर्वोक्तौ। अत्रापि सुपां सुलुगित्याकारादेशो वर्णव्यत्ययेन ह्रस्वत्वं च। (याम्) स्तुतिम् (हुवे) आददे। अत्र व्यत्ययेनात्मनेपदं बहुलं छन्दसीति शपो लुक् च। (याम्) शिल्पक्रियाम्। (ॠधाथे) वर्धयतः। अत्र व्यत्ययो बहुलं छन्दसीति विकरणाभावश्च (सधस्तुतिम्) स्तुत्या सह वर्त्तते ताम्। अत्र वर्णव्यत्ययेन हकारस्य धकारः ॥९॥

मैं जिस प्रकार से इस संसार में जिन इन्द्र और वरुण के गुणों की यह (सुष्टुतिः) अच्छी स्तुति (प्राश्नोतु) अच्छी प्रकार व्याप्त होवे, उसको (हुवे) ग्रहण करता हूँ और (याम्) जिस (सधस्तुतिम्) कीर्त्ति के साथ शिल्पविद्या को (वाम्) जो (इन्द्रावरुणौ) इन्द्र और वरुण (ॠधाथे) बढ़ाते हैं, उस शिल्पविद्या को (हुवे) ग्रहण करता हूँ ॥९॥

 

अन्वयः-

अहं यथात्रेयं सुष्टुतिः प्राश्नोतु प्रकृष्टतया व्याप्नोतु तथा हुवे वां यौ मित्रावरुणौ यां सधस्तुतिमृधाथे वर्धयतस्तां चाहं हुवे ॥९॥                        

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भावार्थः-

मनुष्यैर्यस्य पदार्थस्य यादृशा गुणाः सन्ति तादृशान् सुविचारेण विदित्वा तैरूपकारः सदैव ग्राह्य इतीश्वरोपदेशः ॥९॥

पूर्वस्य षोडशसूक्तस्यार्थानुयोगिनोर्मित्रावरुणार्थयोरत्र प्रतिपादनात्सप्तदश सूक्तार्थेन सह तदर्थस्य संगतिरस्तीति बोध्यम्

इदमपि सूक्तं सायणाचार्य्यादिभिर्यूरोपदेशवासिभिरध्यापक विलसनाख्यादिभिश्चान्यथैव व्याख्यातम् ॥

इति चतुर्थोऽनुवाकः सप्तदशं सूक्तं त्रयस्त्रिंशो वर्गश्च समाप्तः ॥

इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालंकार है। मनुष्यों को जिस पदार्थ के जैसे गुण हैं उनको वैसे ही जानकर और उनसे सदैव उपकार ग्रहण करना चाहिये, इस प्रकार ईश्वर का उपदेश है ॥९॥

पूर्वोक्त सोलहवें सूक्त के अनुयोगी मित्र और वरुण के अर्थ का इस सूक्त में प्रतिपादन करने से इस सत्रहवें सूक्त के अर्थ के साथ सोलहवें सूक्त के अर्थ की संगति करनी चाहिये ॥ 

इस सूक्त का भी अर्थ सायणाचार्य्य आदि तथा यूरोपदेशवासी विलसन आदि ने कुछ का कुछ ही वर्णन किया है ॥ 

यह चौथा अनुवाक, सत्रहवां सूक्त और तेतीसवां वर्ग समाप्त हुआ ॥

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