Rig Veda‎ > ‎Mandal 01‎ > ‎Sukta 017‎ > ‎

Mantra Rig 01.017.002

MANTRA NUMBER:

Mantra 2 of Sukta 17 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 32 of Adhyaya 1 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 59 of Anuvaak 4 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- मेधातिथिः काण्वः

देवता (Devataa) :- इन्द्रावरुणौ

छन्द: (Chhand) :- यवमध्याविराड्गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

गन्ता॑रा॒ हि स्थोऽव॑से॒ हवं॒ विप्र॑स्य॒ माव॑तः ध॒र्तारा॑ चर्षणी॒नाम्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

गन्तारा हि स्थोऽवसे हवं विप्रस्य मावतः धर्तारा चर्षणीनाम्

 

The Mantra's transliteration in English

gantārā hi stho 'vase hava viprasya māvata | dhartārā caraīnām ॥

 

The Pada Paath (Sanskrit)

गन्ता॑राः हि स्थः अव॑से हव॑म् विप्र॑स्य माव॑तः ध॒र्तारा॑ च॒र्ष॒णी॒नाम्

 

The Pada Paath - transliteration

gantārā | hi | stha | avase | havam | viprasya | māvata | dhartārācaraīnām ॥


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati                                                                                                                                                                                                                                                              

०१।०१७।०२

मन्त्रविषयः-

अथेन्द्रवरुणाभ्यां सह संप्रयुक्ता अग्निजलगुणा उपदिश्यन्ते।

अब इन्द्र और वरुण से संयुक्त किये हु अग्नि और जल के गुणों का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थः-

(गन्तारा) गच्छत इति गमनशीलौ। अत्र सुपां सुलुगित्याकारादेशः। (हि) यतः (स्थः) स्तः। अत्र व्यत्ययः। (अवसे) क्रियासिद्ध्येषणायै (हवम्) जुहोति ददात्याददाति यस्मिन् तं होमशिल्पव्यवहारम् (विप्रस्य) मेधाविनः (मावतः) मद्विधस्य पण्डितस्य। अत्र वतुप्प्रकरणे युष्मदस्मद्भ्यां छन्दसि सादृश्य उपसंख्यानम्। अ० ५।२।३९। अनेन वार्त्तिकेनास्मच्छब्दात्सादृश्ये वतुप् प्रत्ययः। आ सर्वनाम्नः। अ० ६।३।९१। इत्याकारादेशश्च (धर्त्तारा) कलाकौशलयन्त्रेषु योजितौ होमरक्षणशिल्पव्यवहारान् धरतस्तौ (चर्षणीनाम्) मनुष्यादिप्राणिनाम्। कृषेरादेशश्च चः। उ० २।१००। अनेन कृषधातोरनिः प्रत्यय आदेश्चकारादेशश्च ॥२॥

जो (हि) निश्चय करके ये संप्रयोग किये हु अग्नि और जल (मावतः) मेरे समान पण्डित तथा (विप्रस्य) बुद्धिमान् विद्वान् के (हवम्) पदार्थों का लेना देना करानेवाले होम वा शिल्प व्यवहार को (गन्तारा) प्राप्त होते तथा (चर्षणीनाम्) पदार्थों के उठानेवाले मनुष्य आदि जीवों के (धर्त्तारा) धारण करनेवाले (स्थः) होते हैं, इससे मैं इनको अपने सब कामों की (अवसे) क्रिया की सिद्धि के लिये (आवृणे) स्वीकार करता हूँ ॥२॥

 

अन्वयः-

यौ ये हि खल्विमे अग्निजले संप्रयुक्ते मावतो विप्रस्य हवं गन्तारौ स्थः स्तश्चर्षणीनां धर्त्तारा धारणशीले चात अहमेतौ स्वस्य सर्वेषां चावसे आवृणे ॥२॥

 

 

भावार्थः-

पूर्वस्मान्मन्त्रात्। (आवृणे) इति क्रियापदस्यानुवर्त्तनम्। विद्वद्भिर्यदा कलायन्त्रेषु युक्तया संयोजिते अग्निजले प्रेर्य्येते तदा यानानां शीघ्रगमनकारके तत्र स्थितानां मनुष्यादिप्राणिनां पदार्थभाराणां च धारणहेतू सुखदायके च भवत इति ॥२॥

पूर्वमन्त्र से इस मन्त्र में (आवृणे) इस पद का ग्रहण किया है। विद्वानों से युक्ति के साथ कलायन्त्रों में युक्त किये हुए अग्नि जल जब कलाओं से बल में आते हैं, तब रथों को शीघ्र चलाने उनमें बैठे हु मनुष्य आदि प्राणी पदार्थों के धारण कराने और सबको सुख देनेवाले होते हैं ॥२॥

Comments