Rig Veda‎ > ‎Mandal 01‎ > ‎Sukta 016‎ > ‎

Mantra Rig 01.016.007

MANTRA NUMBER:

Mantra 7 of Sukta 16 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 2 of Varga 31 of Adhyaya 1 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 55 of Anuvaak 4 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- मेधातिथिः काण्वः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अ॒यं ते॒ स्तोमो॑ अग्रि॒यो हृ॑दि॒स्पृग॑स्तु॒ शंत॑मः अथा॒ सोमं॑ सु॒तं पि॑ब

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अयं ते स्तोमो अग्रियो हृदिस्पृगस्तु शंतमः अथा सोमं सुतं पिब

 

The Mantra's transliteration in English

aya te stomo agriyo hdispg astu śatama | athā soma sutam piba ॥

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अ॒यम् ते॒ स्तोमः॑ अ॒ग्रि॒यः हृ॒दि॒ऽस्पृक् अ॒स्तु॒ शम्ऽत॑मः अथ॑ सोम॑म् सु॒तम् पि॒ब॒

 

The Pada Paath - transliteration

ayam | te | stoma | agriyā | hdii-spk | astu | śam-tama | atha | somam | sutam | piba ॥


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०१६।०७

मन्त्रविषयः

स कीदृग्गुणोऽस्तीत्युपदिश्यते।

उक्त वायु कैसे गुणवाला है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है-

 

पदार्थः

(अयम्) अस्माभिरनुष्ठितः (ते) तस्यास्य (स्तोमः) गुणप्रकाशसमूहक्रियः (अग्रियः) अग्रे भवोऽत्युत्तमः। घच्छौ च। (अष्टा०४.४.११७) अनेनाग्रशब्दाद् घः प्रत्ययः। (हृदिस्पृक्) यो हृद्यन्तःकरणे सुखं स्पर्शयति सः (अस्तु) भवेत्। अत्र लडर्थे लोट्। (शन्तमः) शं सुखमतिशयितं यस्मिन्सः। शमिति सुखनामसु पठितम्। (निघं०३.६) (अथ) आनन्तर्य्ये निपातस्य च इति दीर्घः। (सोमम्) सर्वपदार्थाभिषवम् (सुतम्) उत्पन्नम् (पिब) पिबति। अत्र व्यत्ययो लडर्थे लोट् च ॥७॥

मनुष्यों को जैसे यह वायु प्रथम (सुतम्) उत्पन्न किये हुए (सोमम्) सब पदार्थों के रस को (पिब) पीता है, (अथ) उसके अनन्तर (ते) जो उस वायु का (अग्रियः) अत्युत्तम (हृदिस्पृक्) अन्तःकरण में सुख का स्पर्श करानेवाला (स्तोमः) उसके गुणों से प्रकाशित होकर क्रियाओं का समूह विदित (अस्तु) हो, वैसे काम करने चाहियें ॥७॥

 

अन्वयः

मनुष्यैर्यथाऽयं वायुः पूर्वं सुतं सोमं पिबाथेत्यनन्तरं ते तस्याग्रियो हृदिस्पृक् शंतमः स्तोमो भवेत् तथाऽनुष्ठातव्यम् ॥७॥

 

 

भावार्थः

मनुष्यैः शोधित उत्कृष्टगुणोऽयं पवनोऽत्यन्तसुखकारी भवतीति बोध्यम् ॥७॥

मनुष्यों के लिये उत्तमगुण तथा शुद्ध किया हुआ यह पवन अत्यन्त सुखकारी होता है ॥७॥






Comments