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Mantra Rig 01.016.001

MANTRA NUMBER:

Mantra 1 of Sukta 16 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 1 of Varga 30 of Adhyaya 1 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 49 of Anuvaak 4 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- मेधातिथिः काण्वः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

त्वा॑ वहन्तु॒ हर॑यो॒ वृष॑णं॒ सोम॑पीतये इन्द्र॑ त्वा॒ सूर॑चक्षसः

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

त्वा वहन्तु हरयो वृषणं सोमपीतये इन्द्र त्वा सूरचक्षसः

 

The Mantra's transliteration in English

ā tvā vahantu harayo vṛṣaa somapītaye | indra tvā sūracakasa ॥

 

The Pada Paath (Sanskrit)

त्वा॒ व॒ह॒न्तु॒ हर॑यः वृष॑णम् सोम॑ऽपीतये इन्द्र॑ त्वा॒ सूर॑ऽचक्षसः

 

The Pada Paath - transliteration

ā | tvā | vahantu | haraya | vṛṣaam | soma-pītaye | indra | tvā | sūra-cakasaḥ ॥


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।१६।०१

मन्त्रविषयः-

तत्रेन्द्रगुणा उपदिश्यन्ते।

अब सोलहवें सूक्त का आरम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में सूर्य्य के गुणों का उपदेश किया है।

 

पदार्थः-

(आ) समन्तात् (त्वा) तं सूर्य्यलोकम् (वहन्तु) प्रापयन्तु (हरयः) हरन्ति ये ते किरणाः। हृषिषिरुहि० उ० ४।१२४। इति हृधातोरिन् प्रत्ययः। (वृषणम्) यो वर्षति जलं सा वृषा तम्। कनिन्युवृषि० उ० १।१५४। इति कनिन् प्रत्ययः। वाषपूर्वस्य निगमे। अ० ६।४।९। इति विकल्पाद्दीर्घाभावः। (सोमपीतये) सोमानां सुतानां पदार्थानां पीतिः पानं यस्मिन् व्यवहारे तस्मै। अत्र सहसुपैति समासः। (इन्द्र) विद्वन् (त्वा) तं पूर्वोक्तम्। (सूरचक्षसः) सूरे सूर्य्ये चक्षांसि दर्शनानि येषां ते ॥१॥

हे विद्वान् ! जिस (वृषणम्) वर्षा करनेहारे सूर्य्यलोक को (सोमपीतये) जिस व्यवहार में सोम अर्थात् ओषधियों के अर्क खिचे हुये पदार्थों का पान किया जाता है, उसके लिये (सूरचक्षसः) जिनका सूर्य्य में दर्शन होता है, (हरयः) हरण करनेहारे किरण प्राप्त करते हैं, (त्वा) उसको तू भी प्राप्त हो, जिसको सब कारीगर लोग प्राप्त होते हैं, उसको सब मनुष्य (आवहन्तु) प्राप्त हों। हे मनुष्यो ! जिसको हम लोग जानते है (त्वा) उसको तुम भी जानो ॥१॥

 

अन्वयः-

हे इन्द्र यं वृषणं सोमपीतये सूरचक्षसो हरयः सर्वतो वहन्ति त्वा तं त्वमपि वह यं सर्वे शिल्पिनो वहन्ति तं सर्वे वहन्तु हे मनुष्या यं वयं विजानीमस्त्वा तं यूयमपि विजानीत ॥१॥

 

 

भावार्थः-

याः सूर्य्यस्य दीप्तयस्ताः सर्वरसाहारकाः सर्वस्य प्रकाशिका वृष्टिकराः सन्ति ता यथायोग्यमानुकूल्येन मनुष्यैः सेविता उत्तमानि सुखानि जनयन्तीति ॥१॥

जो सूर्य्य की प्रत्यक्ष दीप्ति सब रसों के हरने सबका प्रकाश करने तथा वर्षा करानेवाली हैं, वे यथायोग्य अनुकूलता के साथ सेवन करने से मनुष्यों को उत्तम-उत्तम सुख देती हैं ॥१॥

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