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Mantra Rig 01.013.006

MANTRA NUMBER:

Mantra 6 of Sukta 13 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 6 of Varga 24 of Adhyaya 1 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 18 of Anuvaak 4 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- मेधातिथिः काण्वः

देवता (Devataa) :- देवीर्द्वार:

छन्द: (Chhand) :- गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

वि श्र॑यन्तामृता॒वृधो॒ द्वारो॑ दे॒वीर॑स॒श्चत॑: अ॒द्या नू॒नं च॒ यष्ट॑वे

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

वि श्रयन्तामृतावृधो द्वारो देवीरसश्चतः अद्या नूनं यष्टवे

 

The Mantra's transliteration in English

vi śrayantām tāvdho dvāro devīr asaścata | adyā nūna ca yaṣṭave ॥

 

The Pada Paath (Sanskrit)

वि श्र॒य॒न्ता॒म् ऋ॒त॒ऽवृधः॑ द्वारः॑ दे॒वीः अ॒स॒श्चतः॑ अ॒द्य नू॒नम् च॒ यष्ट॑वे

 

The Pada Paath - transliteration

vi | śrayantām | ta-vdha | dvāra | devī | asaścata | adya | nūnam | ca | yaṣṭave ॥


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०१३।०६

मन्त्रविषयः-

अथ यज्ञशालायानानि चानेकद्वाराणि रचनीयानीत्युपदिश्यते।

अब अगले मन्त्र में घर यज्ञशाला और विमान आदि रथ अनेक द्वारों के सहित बनाने चाहिये, इस विषय का उपदेश किया है।

 

पदार्थः-

(वि) विविधार्थे (श्रयन्ताम्) सेवन्ताम् (ॠतावृधः) या ॠतं सत्यं सुखं जलं वा वर्धयंति ताः। अत्र अन्येषामपि० इति दीर्घः (द्वारः) द्वाराणि (देवीः) द्योतमानाः। अत्र वाच्छन्दसि ति जसः पूर्वसवर्णत्वम् । (असश्चतः) विभागं प्राप्ताः। अत्र सस्ज गतौ इत्यस्य व्यत्ययेन  जकारस्य चकारः। (अद्य) अस्मिन्नहनि। अत्र निपातस्य च इति दीर्घः। (नूनम्) निश्चये (च) समुच्चये (यष्टवे) यष्टुम्। अत्र यज धातोस्तवेन् प्रत्ययः॥६॥

हे (मनीषिणः) बुद्धिमान् विद्वानो  ! (अद्य) आज (यष्टवे) यज्ञ करने के लिये घर आदि के (असश्चतः) अलग-२ (ॠतावृधः) सत्य सुख और जल के वृद्धि करनेवाले (देवीः) तथा प्रकाशित (द्वारः) दरवाजों का (नूनम्) निश्चय से (विश्रयन्ताम्) सेवन करो, अर्थात् अच्छी रचना से उनको बनाओ ॥६॥

 

अन्वयः-

हे मनीषिणोऽद्य यष्टवे गृहादेरसश्चत ॠतावृधो देवीर्द्वारो नूनं विश्रयन्ताम् ॥६॥

 

 

भावार्थः-

मनुष्यैरनेकद्वाराणि गृहयज्ञशालायानानि रचयित्वा तत्र स्थितिं हवनं गमनागमने च कर्त्तव्ये ॥६॥

इति चतुर्विंशो वर्गः समाप्तः ॥

मनुष्यों को अनेक प्रकार के द्वारों के घर यज्ञशाला और विमान आदि यानों को बनाकर उनमें स्थिति होम और देशान्तरों में जाना-आना करना चाहिये ॥६॥

यह चौबीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ

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