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Mantra Rig 01.013.005

MANTRA NUMBER:

Mantra 5 of Sukta 13 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 24 of Adhyaya 1 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 17 of Anuvaak 4 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- मेधातिथिः काण्वः

देवता (Devataa) :- बर्हिः

छन्द: (Chhand) :- गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

स्तृ॒णी॒त ब॒र्हिरा॑नु॒षग्घृ॒तपृ॑ष्ठं मनीषिणः यत्रा॒मृत॑स्य॒ चक्ष॑णम्

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

स्तृणीत बर्हिरानुषग्घृतपृष्ठं मनीषिणः यत्रामृतस्य चक्षणम्

 

The Mantra's transliteration in English

stṛṇīta barhir ānuag ghtapṛṣṭham manīia | yatrāmtasya cakaam ॥

 

The Pada Paath (Sanskrit)

स्तृ॒णी॒त ब॒र्हिः आ॒नु॒षक् घृ॒तऽपृ॑ष्ठम् म॒नी॒षि॒णः॒ यत्र॑ अ॒मृत॑स्य चक्ष॑णम्

 

The Pada Paath - transliteration

stṛṇīta | barhi | ānuak | ghta-pṛṣṭham | manīia | yatra | amtasya | cakaam ॥


महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०१३।०५

मन्त्रविषयः-

पुनः स एवं सम्प्रयुक्तः किं करोतीत्युपदिश्यते।

फिर वह भौतिक अग्नि उक्त प्रकार से क्रिया में युक्त किया हुआ क्या करता है, सो अगले मन्त्र में उपदेश किया है।

 

पदार्थः-

(स्तृणीत) आच्छादयत (बर्हिः) अन्तरिक्षम् (आनुषक्) अभितो यदनुषंगि तत् (घृतपृष्ठम्) घृतमुदकं पृष्ठे यस्मिँस्तत् (मनीषिणः) मेधाविनो विद्वांसः। मनीषीति मेधाविनामसु पठितम्। निघं० ३।१५। (यत्र) यस्मिन्नन्तरिक्षे (अमृतस्य) उदकसमूहस्य। अमृमित्युदकनामसु पठितम्। निघं० ११२ (चक्षणम्) दर्शनम्। चक्षिङ् दर्शने इत्यस्माल्ल्युटि प्रत्यये परे असनयोश्च। अ० २।४।५४। इति वार्त्तिकेन ख्याञादेशाभावः ॥५॥

हे (मनीषिणः) बुद्धिमान् विद्वानो  ! (यत्र) जिस अन्तरिक्ष में (अमृतस्य) जलसमूह का (चक्षणम्) दर्शन होता है, उस (आनुषक्) चारों ओर से घिरे और  (घृतपृष्ठम्) जल से भरे हु (बर्हिः) अन्तरिक्ष को (स्तृणीत) होम के धूम से आच्छादन करो, उसी अन्तरिक्ष में अन्य भी बहुत पदार्थ जल आदि को जानो ॥५॥

 

अन्वयः-

हे मनीषिणो यत्रामृतस्य चक्षणं वर्त्तते तदानुषग्घृतपृष्ठं बर्हिः स्तृणीताच्छादयत ॥५॥

 

 

भावार्थः-

विद्वद्भिरग्नौ यद् घृतादिकं प्रक्षिप्यते तदन्तरिक्षानुगतं भूत्वा तत्रस्थस्य जलसमूहस्य शोधकं जायते तच्च सुगन्ध्यादिगुणैः सर्वान्पदार्थानाच्छाद्य सर्वान् प्राणिनः सुखायुक्तान् सद्यः सम्पादयतीति ॥५॥

विद्वान् लोग अग्नि में जो घृत आदि पदार्थ छोड़ते हैं, वे अन्तरिक्ष को प्राप्त होकर वहाँ के ठहरे हु जल को शुद्ध करते हैं, और वह शुद्ध हुआ जल सुगन्धि आदि गुणों से सब पदार्थों को आच्छादन करके सब प्राणियों को सुखयुक्त करता है ५॥

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