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Mantra Rig 01.004.005

MANTRA NUMBER:

Mantra 5 of Sukta 4 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Varga 7 of Adhyaya 1 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 5 of Anuvaak 2 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

उ॒त ब्रु॑वन्तु नो॒ निदो॒ निर॒न्यत॑श्चिदारत दधा॑ना॒ इन्द्र॒ इद्दुव॑:

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

उत ब्रुवन्तु नो निदो निरन्यतश्चिदारत दधाना इन्द्र इद्दुवः

 

The Mantra's transliteration in English

uta bruvantu no nido nir anyataś cid ārata | dadhānā indra id duva ॥

 

The Pada Paath (Sanskrit)

उ॒त ब्रु॒व॒न्तु॒ नः॒ निदः॑ निः अ॒न्यतः॑ चित् आ॒र॒त॒ दधा॑नाः इन्द्रे॑ इत् दुवः॑

 

The Pada Paath - transliteration

uta | bruvantu | na | nida | ni | anyata | cit | ārata | dadhānā | indre | it | duvaḥ ॥



महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।००४।०

मन्त्रविषयः-

पुनः सएवार्थ उपदिश्ते।

ईश्वर ने फिर भी इसी विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है।

 

पदार्थ:

 

(उत) अप्येव (ब्रुवन्तु) सर्वा विद्या उपदिशन्तु। (नः) अस्मभ्यं (निदः) निन्दितारः। णिदि कुत्सायाम् अस्मात् क्विप् छान्दसो वर्णलोपो वेति नलोपः। (निः) नितरां (अन्यतः) देशात् (चित्) अन्ये (आरत) गच्छन्तु। व्यवहिताश्चेत्युपसर्गव्यवधानम्। अत्र व्यत्ययः। (दधानाः) धारयितारः (इन्द्रे) परमैश्वर्य्ययुक्ते परमेश्वरे (इत्) इतः। इयते प्राप्तये सोयमिद्देशः। अत्र कर्मणि क्विप्। ततः सुपां सुलुगिति ङसेर्लुक् (दुवः) परिचर्यायाम् ॥५॥

जो कि परमेश्वर की (दुवः) सेवा को धारण किये हुए, सब विद्या धर्म और पुरुषार्थ में वर्तमान हैं, वे ही (नः) हम लोगों के लिये सब विद्याओं का उपदेश करें, और जो कि (चित्) नास्तिक (निदः) निन्दक वा धूर्त मनुष्य हैं, वे सब हम लोगों के निवास स्थान से (निरारत) दूर चले जावें, किन्तु (उत) निशचय करके और देशों से भी दूर हो जायँ। अर्थात् अधर्मी पुरुष किसी देश में न रहें ॥५॥

 

अन्वय:

य इन्द्रे परमेश्वरे दुवः परिचर्य्यां दधानाः सर्वासु विद्यासु धर्मे पुरुषार्थे च वर्त्तमानाः सन्ति त उतैव नोऽस्मभ्यं सर्वा विद्या ब्रुवन्तूपदिशन्तु। ये चिदन्ये नास्तिका निदो निन्दितारोऽविद्वांसो धूर्ताः सन्ति ते सर्व इतो देशादस्मन्निवासान्निरारत दूरे गच्छन्तु उतान्यतो देशादपि निःसरन्तु अर्थादधार्मिकाः पुरुषाः क्वापि मा तिष्ठेयुरिति ॥५॥

 

 

भावार्थ:

सर्वैर्मनुष्यैराप्तविद्वत्संगेन मूर्खसङ्गत्यागेनेत्थं पुरुषार्थः कर्तव्यो यतः सर्वत्र विद्यावृध्दिरविद्याहानिश्च मान्यानां सत्कारो दुष्टानां ताडनं चेश्वरोपासना पापिनां निवृत्तिर्धार्मिकाणां वृध्दिश्च नित्यं भवेदिति ॥५॥

इति सप्तमो वर्गः समाप्तः ॥

सब मनुष्यों को उचित है कि प्राप्त धार्मिक विद्वानों का सङ्ग कर और मूर्खों के संग को सर्वथा छोडके ऐसा पुरुषार्थ करना चाहिये कि जिससे सर्वत्र विद्या की वृध्दि, अविद्या की हानि, मानने योग्य श्रेष्ठ पुरुषों का सत्कार, दुष्टों को दंड, ईश्वर की उपासना आदि शुभ कर्मों की वृध्दि और अशुभ कर्मों का विनाश नित्य होता रहे ॥५॥

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