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Mantra Rig 01.004.003

MANTRA NUMBER:

Mantra 3 of Sukta 4 of Mandal 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Varga 7 of Adhyaya 1 of Ashtak 1 of Rig Veda

Mantra 3 of Anuvaak 2 of Mandal 1 of Rig Veda

 

 

MANTRA DEFINITIONS:

ऋषि:   (Rishi) :- मधुच्छन्दाः वैश्वामित्रः

देवता (Devataa) :- इन्द्र:

छन्द: (Chhand) :- विराड्गायत्री

स्वर: (Swar) :- षड्जः

 

 

THE MANTRA

 

The Mantra with meters (Sanskrit)

अथा॑ ते॒ अन्त॑मानां वि॒द्याम॑ सुमती॒नाम् मा नो॒ अति॑ ख्य॒ ग॑हि

 

The Mantra without meters (Sanskrit)

अथा ते अन्तमानां विद्याम सुमतीनाम् मा नो अति ख्य गहि

 

The Mantra's transliteration in English

athā te antamānā vidyāma sumatīnām | mā no ati khya ā gahi ॥

 

The Pada Paath (Sanskrit)

अथ॑ ते॒ अन्त॑मानाम् वि॒द्याम॑ सु॒ऽम॒ती॒नाम् मा नः॒ अति॑ ख्यः॒ ग॒हि॒

 

The Pada Paath - transliteration

atha | te | antamānām | vidyāma | su-matīnām | mā | na | ati | khya | ā | gahi ॥



महर्षि दयानन्द सरस्वती  Maharshi Dayaananda Saraswati

०१।०४।०३

मन्त्रविषयः-

येनायं सूर्य्यो रचितस्तं कथं जानीमेत्युपदिश्यते।

जिसने सूर्य्य को बनाया है, उस परमेश्वर ने अपने जानने का उपाय अगले मंत्र में बताया है।

 

 

 

 

पदार्थः-

(अथ) अनन्तरार्थे। निपातस्य चेति दीर्घः (ते) तव (अन्तमानाम्) अन्तः सामीप्यमेषामस्ति तेऽन्तिका अतिशयेनान्तिका अन्तमास्तत्समागमेन। अत्रान्तिकशब्दात्तमपि कृते पृषोदरादित्वात्तिकलोपः। अन्तमानामित्यन्तिकनामसु पठितम्। निघं० २।१६। (विद्याम) जानीयाम (सुमतीनाम्) वेदादिशास्त्रे परोपकारे धर्माचरणे च श्रेष्ठा मतिर्येषां मनुष्याणां। मतय इति मनुष्यानामसु पठितम्। निघं० २।३। (मा) निषेधार्थे (नः) अस्मान् (अतिख्यः) उपदेशोल्लंघनं मा कुर्याः (आगहि) आगच्छ ॥३॥

हे परम ऐश्वर्ययुक्त परमेश्वर ! (ते) आपके (अन्तमानाम्) निकट अर्थात् आपको जानकर आपके समीप तथा आपकी आज्ञा में रहने वाले विद्वान् लोग, जिन्हों की (सुमतीनाम्) वेदादि शास्त्र परोपकार रूपी धर्म करने में श्रेष्ठ बुद्धि हो रही है, उनके समागम से हम लोग (विद्याम) आपको जान सकते हैं, और आप (नः) हमको (आगहि) प्राप्त अर्थात् हमारे आत्माओं में प्रकाशित हूजिये, और (अथ) इसके अनन्तर कृपा करके अन्तर्यामिरूप से हमारे आत्माओं में स्थित हुए (मातिख्यः) सत्य उपदेश को मत रोकिये, किंतु उसकी प्रेरणा सदा किया कीजिये ॥३॥

 

अन्वय:

हे परमैश्वर्य्यवन्निन्द्र परमेश्वर ! वयं ते तवान्तमानामर्थात्त्वां ज्ञात्वा त्वन्निकटे त्वदाज्ञायां च स्थितानां सुमतीनामाप्तानां विदुषां समागमेन त्वां विजानीयाम। त्वन्नोऽस्मानागच्छास्मदात्मनि प्रकाशितो भव। अथान्तर्यामितया स्थितः सन्सत्यमुपदेशं मातिख्यः कदाचिदस्योल्लंघनं मा कुर्य्याः ॥३॥

 

 

 

भावार्थ:

यदा मनुष्या धार्मिकाणां विद्वत्तमानां सकाशाच्छिक्षाविद्ये प्राप्रुवन्ति तदा नैव पृथिवीमारभ्य परमेश्वरपर्य्यन्तान् पदार्थान् विदित्वा सुखिनो भूत्वा पुनस्ते कदाचिदन्तर्यामीश्वरोपदेशं विहायेतस्ततो भ्रमन्तीति ॥३॥

जब मनुष्य लोग इन धार्मिक श्रेष्ठ विद्वानों के समागम से शिक्षा और विद्या को प्राप्त होते हैं, तभी पृथिवी से लेकर परमेश्वरपर्य्यन्त पदार्थों के ज्ञान द्वारा नाना प्रकार से सुखी होके फिर वे अन्तर्यामी ईश्वर के उपदेश को छोडकर कभी इधर-उधर नहीं भ्रमते ॥३॥

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